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नईदिल्ली, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को कहा कि सॉफ्ट ड्रिंक्स, तंबाकू, कोल और कारों जैसे सामान पर सेस जारी रहेगा। इसका उपयोग मार्च 2026 तक राज्यों को जीएसटी नुकसान की भरपाई के लिए उठाए गए लोन के भुगतान में होगा। पिछले साल अक्टूबर में वित्त मंत्रालय ने कहा था कि केंद्र सरकार राज्यों के वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की कमी को पूरा करने के लिए 1.1 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेगी। कर्ज ली गई राशि को राज्यों को दिया जाएगा। इसे उन्हें जीएसटी क्षतिपूर्ति उपकर (GST Compensation Cess) रिलीज के बदले में लोन के तौर पर दिया जाएगा।

12 लाख करोड़ कर्ज लेगी सरकार

सरकार ने फरवरी में बजट में घोषणा की थी कि वित्त वर्ष 2021-22 में करीब 12 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लिया जाएगा। सितंबर 2020 तक भारत का कुल सार्वजनिक कर्ज 1,07,04,293.66 करोड़ (107.04 लाख करोड़) रुपये तक पहुंच गया। इसमें आंतरिक कर्ज 97.46 लाख करोड़ और बाहरी कर्ज 6.30 लाख करोड़ रुपये का था। सार्वजनिक कर्ज में केंद्र और राज्य सरकारों की कुल देनदारी आती है जिसका भुगतान सरकार सरकार के समेकित फंड से किया जाता है। सरकार का खर्च हमेशा उसकी आय से ज्यादा होता है। सरकार को श‍िक्षा, स्वास्थ्य और इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे कल्याणकारी और विकास कार्यों पर भारी खर्च करना पड़ता है। इसलिए उसे उधार लेने की जरूरत पड़ती है।

आंतरिक कर्ज

सरकार दो तरह से लोन लेती है आंतरिक और बाहरी। आंतरिक कर्ज देश के भीतर से होता है और बाहरी कर्ज विदेशों से लिया जाता है। आंतरिक कर्ज देश के बैंकों, बीमा कंपनियों, रिजर्व बैंक, कॉरपोरेट कंपनियों और म्यूचुअल फंडों आदि से लिया जाता है। सरकार आमतौर पर सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) के द्वारा कर्ज लेती है। मार्केट स्टेबिलाइजेशन बॉन्ड, ट्रेजरी बिल, स्पेशल सिक्योरिटीज, गोल्ड बॉन्ड, स्माल सेविंग स्कीम, कैश मैनेजमेंट बिल आदि के द्वारा जो भी पैसा आता है, वह सरकार के लिए एक कर्ज ही होता है।

भारत पर विदेशी कर्ज

आरबीआई के जून में जारी किए गए आंकड़े के मुताबिक 2021 के मार्च महीने की समाप्ति पर भारत का विदेशी कर्ज एक साल पहले से 11.5 अरब डॉलर बढ़ कर 570 अरब डॉलर हो गया। मार्च के अंत में विदेशी कर्ज जीडीपी का 21.1 प्रतिशत था। यह अनुपात एक साल पहले 20.6 प्रतिशत था। विदेशी ऋण में विदेशों से लिया गया वाणिज्यिक ऋण का हिस्सा सबसे ज्यादा (37.4 प्रतिशत) है। इसके बाद प्रवासी जमा धन (24.9 प्रतिशत) और अल्पकालीन व्यापार ऋण (17.1 प्रतिशत) आते हैं। अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व वाला ऋण भारत के विदेशी कर्ज का सबसे बड़ा घटक है। इसकी हिस्सेदारी 52.1 प्रतिशत थी। इसके बाद भारतीय रुपया (33.3 प्रतिशत), जापानी येन (5.8 प्रतिशत), एसडीआर- (4.4 प्रतिशत) और यूरो ऋण (3.5 प्रतिशत) आते हैं।

बाहरी कर्ज

बाहरी कर्ज मित्र देशों, आईएफएम और वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाओं और एनआरआई आदि से लिया जाता है। इस प्रकार के ऋण का सबसे बड़ा घाटा यह है कि सरकार को इस प्रकार के लोन चुकाने के लिए डॉलर, पौण्ड और यूरो जैसी मुद्राओं में ऋण के साथ साथ मूलधन का भुगतान करना पड़ता है। सरकार अपनी कुल आय का 18 से 19% हिस्सा केवल ऋण भुगतान के रूप में खर्च करती है। इसके अलावा भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय फ्लोट बांड्स भी जारी करती है, जिससे बड़ी मात्रा में सरकार के पास विदेशी मुद्रा आती है। इस प्रकार के बांड्स से सरकार को यह फायदा होता है कि सरकार इन बांड्स पर ब्याज का भुगतान भारतीय रुपयों में देती है जिससे विदेशी मुद्रा बच जाती है।

बजट के बाहर कर्ज

इसके अलावा कुछ उधार ऐसा होता है जिसे ऑफ बजट कहते हैं। ये सीधे केंद्र सरकार नहीं लेती, इसलिए इसका असर राजकोषीय घाटे में नहीं दिखाया जाता। बजट में इसका जिक्र नहीं होता है। ये कुछ सार्वजनिक कंपनियों, सरकारी संस्थाओं के लोन या डेफर्ड पेमेंट के रूप में होते हैं। माना जाता है कि ये लोन संस्थान सरकार के निर्देश पर ही लेते हैं, लेकिन इसे चुकाने की जवाबदेही सरकार पर नहीं होती। यही वजह है कि इसे बजट में शामिल नहीं किया जाता। पिछले साल सरकार ने राशन बांटने में एफसीआई के सब्सिडी बिल का आधा हिस्सा ही आवंटित किया। बाकी पैसा उसे नेशनल स्मॉल सेविंग फंड्स से उधार लेने को कहा गया। इसी तरह फर्टिलाइजर सब्सिडी के लिए कुछ हिस्सा सरकारी बैंकों से लोन के रूप में दिलाया गया।

राज्यों को जीएसटी क्षतिपूर्ति

जीएसटी में कमी की भरपाई के लिए केंद्र ने पिछले साल अगस्त में राज्यों को दो विकल्प दिए थे। इसके तहत या तो वे आरबीआई की विशेष सुविधा के जरिए 97,000 करोड़ रुपये कर्ज ले सकते थे। या फिर बाजार से 2.35 लाख करोड़ रुपये का कर्ज ले सकते थे। बाद में कुछ राज्यों की मांग पर पहले विकल्प के तहत रकम को 97 हजार करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1.11 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया था। इसके अलावा लोन को चुकाने के लिए सिगरेट, बीड़ी और शराब जैसी विलासिता की वस्तुओं पर लगने वाले जीएसटी क्षतिपूर्ति उपकर को 2022 के बाद भी लगाने का प्रस्ताव किया गया था।

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