CJP; जंतर मंतर आंदोलन का काला पक्ष……………

इस देश के लोगों ने आजादी के बाद अनेक राष्ट्रीय और राज स्तरीय आंदोलन देखे है।शांति और अशांतिपूर्ण दोनों प्रकार के आंदोलनों का अनुभव इस देश के  वासियों के पास है।  आज के लेख को राष्ट्रीय स्तर के आंदोलन और आंदोलनकारियों के  चरित्र को लेकर ही सीमित करते है।
इस देश के नागरिकों को भीम राव अंबेडकर द्वारा निर्मित संविधान में मूल अधिकार दिये गए है उनमें अपनी जायज मांगों को सरकार के सामने रखने के लिए वैध तरीके से पूर्ण कराने के लिए शांतिपूर्ण ढंग से धरना, प्रदर्शन, अनशन और  आमरण अनशन की स्वतंत्रता प्रदान करती है।
इसी का उपयोग कर पटना के गांधी मैदान में   1975 के साल में जय प्रकाश नारायण ने समग्र क्रांति  आंदोलन चलाया था। इस आंदोलन की सफलता ये थी कि  देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को इमरजेंसी लगानी पड़ी। इस आंदोलन के दो साल बाद देश में पहली बार गैर कांग्रेस सरकार के रूप में जनता पार्टी के मोरारजी देसाई के नेतृत्व में नई सरकार ने  सत्ता सम्हाली। इस आंदोलन में देश का युवा वर्ग  का प्रतिनिधित्व था। छात्र राजनीति से नए  चेहरे के रूप में मुलायम सिंह, लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे नेतृत्व उभरे जो कालांतर में मुख्य मंत्री और केंद्रीय मंत्री बने।
देश ने दूसरा बड़ा आंदोलन महेंद्र सिंह  टिकैत(बाबा टिकैत) 1988 में किसानों के समर्थन में देखा। दिल्ली के बोट क्लब में पांच लाख किसानों का जमावड़ा हुआ था। इस आंदोलन के बाद केंद्र में राजीव गांधी की सरकार  लोकसभा चुनाव हार गई और जन मोर्चा से विश्वनाथ प्रताप सिंह नए  प्रधानमंत्री बने।
देश में तीसरा बड़ा आंदोलन अन्ना हजारे का आंदोलन था।2011 में भ्रष्ट्राचार के मुद्दे को लेकर लोकपाल बिल लाने की मांग को लेकर अन्ना ने मनमोहन सिंह की सरकार को ऐसे घेरा कि तीन साल बाद मनमोहन सिंह की सरकार सत्ता से बाहर हो गई। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी।साथ ही इस आंदोलन से देश की राजधानी दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने जन्म लिया और अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बन गए।
नवंबर 2020 में  भाजपा सरकार द्वारा किसानों के लिए बनाए गए तीन कानूनों के विरोध में राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन हुआ था। इस आंदोलन का प्रभाव ये हुआ कि सरकार को तीनों कानून को वापस लेना पड़ा। इस समझदारी का नतीजा ये हुआ कि भाजपा सरकार 2024 में तीसरी बार सत्ता में आ गई।
इन चारों आंदोलन की खासियत थी कि ये चाहे शांतिपूर्ण ढंग से चले या इनका अंत अशांतिपूर्ण रहा लेकिन चारों आंदोलनों में सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन था।  विरोध श्लील  था। भले ही उग्र स्वर में नारे लगते थे लेकिन मर्यादित हुआ करते थे। चारों आंदोलनों में देश के प्रधानमंत्री पद निशाने पर था लेकिन व्यक्तिगत तौर पर पोस्टरबाजी, नारेबाजी, गाली गलौच सहित अश्लीलता नहीं थी। देश के नामवर कार्टूनिस्टों ने कार्टून बनाए विरोध किया लेकिन इनमें देश के प्रधानमंत्री के पद की महत्ता को छोटा नहीं  किया चाहे प्रधानमंत्री कांग्रेस का रहा हो या गैर कांग्रेसीअमर्यादित नहीं हुए।
अब आता है पांचवा आंदोलन,नीट परीक्षा सहित अनेक परीक्षाओं के पेपर लीक मामले को लेकर सोशल मीडिया में सृजित  फोरम काकरोच जनता पार्टी ने  सोनम वांगचुक के नेतृत्व में आंदोलन किया।इसकी शुरूआत से ही भीम राव अंबेडकर द्वारा निर्मित संविधान की प्रति लेकर ये प्रचारित किया गया था कि संवैधानिक  तरीके से ही आंदोलन को गति दी जाएगी। जैसे जैसे दिन गुजरते हुए  आंदोलन में एक ऐसे वर्ग ने प्रवेश किया जिसने अमर्यादित, अशोभनीय और अश्लीलता को प्रमुखता दिया।  देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा मांगने वालो ने प्रधान मंत्री के व्यक्तिगत जीवन पर जिस प्रकार की घटिया  बेहूदगी का प्रदर्शन किया  वह शर्मनाक, आलोचनीय और  निंदनीय है।  दुखद बात ये भी है कि सुनियोजित तरीके से रील प्रसारक संस्कृति के वाहकों ने  इसे देखा और प्रोत्साहित भी किया। खुद को जेन जी का प्रतिनिधित्व करने वाली कुछ युवतियों ने जिस प्रकार अश्लीलता दिखाई  ये उनके परिवार के कमजोर परवरिश का इजहार करता है। आमतौर पर अभिभावक जानते है कि उनके पुत्र घर के बाहर मां बहन के रिश्तों पर अश्लील गालियां देते है लेकिन पुत्रियों से ऐसी अपेक्षा नहीं रखते है। वैसे भी लड़कियां अपने संयमित, श्लील आचरण के लिए श्रद्धागत होती है। कुछ लड़कियों ने अश्लीलता की  हद– बोल कर, हावभाव से,  पोस्टर बना कर किया। ये किस प्रकार के जेन जी है? जिनको उनके मां बाप ने ये सिखाया है कि जाओ बेटी जिस पद पर जिंदगी भर नहीं पहुंच सकते उसके व्यक्तिगत, पारिवारिक मामले पर गाली गलौच करो।
  सीजेपी के अभिजीत दीपके एक तरफ आंदोलनकारियों के विरुद्ध पुलिस कार्यवाही के विरोध में रील खोज खोज कर पुलिस कर्मियों के खिलाफ कार्यवाही के लिए दबाव बना रहे है। अपनी मांगो में एक मांग आंदोलन करियो पर न्यायिक कार्यवाही न करने की मांग करते है। क्या वे अपने आंदोलन से ऐसे लोगों को चिन्हित कर उन्हें पुलिस के हवाले करने की ताकत रखते है जिन्होंने अश्लीलता की हदे पार की है।
इस देश में आंदोलन करने की प्रक्रिया में सुधार की अनिवार्यता है। सात करोड़ आबादी वाले देश थाईलैंड में किसी भी आंदोलन को तभी प्रशासकीय स्वीकृति मिलती है जब वे प्रशासन को आंदोलनकारियों के नाम सहित पता, मोबाइल नंबर, पहचान पत्र की प्रति जमा करवा देते है।ये कार्य आंदोलन प्रारंभ होने के पहले किया जाता है। आंदोलनकारियों को निश्चित जगह उपलब्ध कराई जाती है। सरकारी तौर पर अल्पाहार  प्रदान किया जाता है।  हिंदुस्तान  थाईलैंड से इतना ही सीख ले।

स्तंभकार-संजयदुबे

  • Narayan Bhoi

    Narayan Bhoi is a veteran journalist with over 40 years of experience in print media. He has worked as a sub-editor in national print media and has also worked with the majority of news publishers in the state of Chhattisgarh. He is known for his unbiased reporting and integrity.

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