
आईआईटी मुंबई में अनुसुचित जाति के छात्र साहिल वाकोड़े के परीक्षा में नकल करने के प्रयास में पकड़े जाने के बाद तथाकथित आत्म ग्लानि के रूप आत्महत्या कर लेने और इसके बाद लगातार चल रही राजनीति और प्रबंधन सुर्खियों में है।
ये माना जाता है कि किसी भी छात्र द्वारा आईआईटी के किसी भी संस्थान से कोई भी डिग्री हासिल कर लेने से आईआईटियन का लेबल लग जाता है। ज्ञात रहे आईआईटी में केवल इंजीनियरिंग की पढ़ाई नहीं होती बल्कि कई फेकल्टी खोल दी गई है जिसके लिए जेईई परीक्षा देने की जरूरत नहीं होती। इंजीनियरिंग के अलावा एआई,एयरो स्पेस, लॉ, बैचलर ऑफ डिजाइन ऐसे ही कोर्स है। जेईई में सामान्य, अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों के द्वारा प्राप्तांक के आधार पर कोर्स मिलता है। साहिल वाकोड़े एनर्जी साइंस और इंजीनियरिंग फैकल्टी का छात्र था।
जिस प्रकार सरकारी सेवा में आईएएस का रुतबा होता है कमोबेश ऐसा ही रुतबा आईआईटी के मेधावी छात्रों का होता है। इनके लिए मल्टी नेशनल कंपनी के साथ आईएएस, आईपीएस आईएफएस जैसी प्रतिष्ठित सर्विस में आना दूसरे विद्यार्थियों की तुलना में सरल होता है
आईआईटी में आजाने का मतलब सफल हो जाना भी नहीं होता है।स्कूल और कॉलेज की जिंदगी उतना ही फर्क होता है जितना घर में अभिभावक के साथ रहने और आजादी से हॉस्टल में रहने की होती है।
साहिल वाकोड़े पढ़ाई में कैसे थे? इसका पता उन्हें उनके अभिभावकों सहित आईआईटी को सेमेस्टर परीक्षा के परिणाम से ही पता चलता। इसके पहले ही तथाकथित रूप से एआई के जरिए किसी प्रश्न के उत्तर के मामले में पकड़ा गए। ऐसी भी जानकारी है कि उनको केवल चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। एक कम उम्र का विद्यार्थी निश्चित रूप से डर सकता है कि ऐसे मामले की गूंज केवल कैंपस तक सीमित नहीं रहेगी।घर में भी अभिभावकों को पता चल सकता है ।इस डर से साहिल खुद को निकाल नहीं पाये। उन्होंने जो कदम उठाया निश्चित रूप से उनके अभिभावकों के लिए वेदना का विषय है। किसी भी परिवार के प्रतिभावान संभावना का अंत दुखद होता है
आईआईटी में जिन प्रोफेसर ने साहिल को ए की मदद से नकल करते पकड़ा उनके विरुद्ध साहिल वाकोड़े के अभिभावक सहित अनेक छात्र संगठन आंदोलनरत है। एफआईआर भी हो चुकी है। ईमानदारी से अपना दायित्व निभाकर नकल रोकने वाले प्रोफेसर साहब को विभाग हटा दिया गया संस्थान से जांच के नाम पर जबरिया अवकाश में भेज दिया गया। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने तो उन्हें सस्पेंड भी कर दिया था।
गुरु शिष्य परम्परा की बात करे तो ईश्वर ने अपने से ऊपर गुरु को स्थान दिया है। एक समय में गुरु के द्वारा दिए गए दंड और डांट फटकार को न केवल छात्र बल्कि अभिभावक भी स्वस्थ मन से स्वीकार करते थे। समाज में संयुक्त परिवार के रहते तक
कदापि मान मर्यादा बची रही। एकल परिवार और सीमित संतान होने के बाद परिस्थितियां बदलते गई। अभिभावक स्वयं ही अपने बच्चे को स्नेहवश डांट मार नहीं पा रहे है उनके बच्चे को कोई गैर कैसे डांट मार सकता है?
दूसरे तरफ शिक्षकों के लिए भी आचरण संहिता बन गई है।मारपीट पर पाबंदी है। डांट फटकार पर भी कार्यवाही हो जाती है। इसके चलते शिक्षक भी जितना हो सकता है टालने की कोशिश करते है। शिक्षक भी जान रहे है कि बात बात में झंझट होती है।रोहित वेमुला का मामला याद है सभी को।
वैसे भी बहुमत में शिक्षक आंख बंद कर चुके है।अच्छे परिणाम का सरकार ऐसे ही दबाव बना कर रखी है। आंसर सीट जांचने के लिए निर्देश मिलते है कि फैल नहीं करना है। अपने बच्चों के पेपर के सामान जांचने की बात सामान्य है। कुछ जिद्दी शिक्षक होते है जैसे एस एन डुल्ला निकल गए। नकल करते पकड़ लिए। दुनिया भर की दिक्कत झेल रहे है।मृतक के अभिभावक जाति सूचक मामले में एफआईआर दर्ज करा दिए है।
क्या ऐसे दौर को देखना मजबूरी होगी कि इंजीनियर, डॉक्टर्स, या अनुसंधान क्षेत्र में अयोग्य लोग चाहे वे किसी भी जाति के हो दबाव के चलते उत्तीर्ण होकर आ जाए? कोई पुल गिरवा दे, किसी की जान लेले, किसी क्षेत्र विशेष में बखेड़ा खड़ा कर दे? अगर यही सब करना है तो शिक्षक को आंख बंद कर ऐच्छिक नकल को अनुमति दे देना चाहिए।
स्तंभकार- संजय दुबे







