बिलासपुर, न्याय की उम्मीद में अदालत पहुंचने वाले आम लोगों के लिए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक बेहद राहत भरा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। दरअसल, स्पष्ट किया न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कानूनी मामले में वकील से लापरवाही या चूक हो जाती है, तो इसका खामियाजा निर्दोष पक्षकारों को बिल्कुल नहीं भुगतना चाहिए। अक्सर देखा जाता है कि कानूनी दांव-पेंच और तय समय-सीमा की जानकारी न होने के कारण आम आदमी अपने वकील पर पूरी तरह निर्भर रहता है। परिणाम स्वरूप,हाईकोर्ट की यह कड़ी टिप्पणी न्यायिक प्रणाली में जनता के विश्वास को और भी मजबूत करने वाली है।
क्या था पूरा मामला
यह अहम फैसला बलौदा बाजार जिले के किरवाई और दरचुरा गांवों से जुड़े एक जमीनी विवाद के संदर्भ में आया है। इस मामले में कमल प्रसाद नाम के व्यक्ति ने आरोप लगाया था कि जयराम दुबे ने फर्जी ‘पावर ऑफ अटॉर्नी’ तैयार करके उनकी जमीन अन्य लोगों को बेच दी है। हालांकि, जमीन खरीदने वाले प्रतिवादियों ने अदालत में दावा किया कि यह सौदा पूरी तरह से कानूनी और पंजीकृत था। लेकिन, सुनवाई के दौरान सबूत पेश करने के वक्त प्रतिवादी अदालत में मौजूद नहीं रह सके, जिसके बाद ट्रायल कोर्ट ने उनकी बात सुने बिना ही एकतरफा फैसला सुना दिया।
इसके अलावा, जब पीड़ित पक्ष ने अपने वकील को इस फैसले के खिलाफ अपील दायर करने का निर्देश दिया, तो वकील ने तय समय-सीमा के भीतर अपील ही दायर नहीं की। इतना ही नहीं, वकील ने भारी लापरवाही बरतते हुए मुवक्किल की फाइल महज किसी अन्य वकील को सौंप दी। बाद में जब माफीनामे के साथ देरी से अपील दायर की गई, तो निचली अदालत ने समय-सीमा खत्म होने का हवाला देकर उसे सिरे से खारिज कर दिया। अंततः, परेशान होकर पीड़ितों ने न्याय के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट के 1981 के फैसले का दिया गया हवाला
मामले की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की बेंच ने पीड़ितों को बड़ी राहत प्रदान की है। अदालत ने अपील में हुई देरी को माफ कर दिया और ट्रायल कोर्ट को उन याचिकाओं पर उनके गुण-दोष के आधार पर फिर से विचार करने का सख्त निर्देश दिया है। इसके साथ ही, उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के साल 1981 के ‘रफीक बनाम मुंशीलाल’ केस के फैसले का भी प्रमुखता से जिक्र किया।
अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब कोई व्यक्ति किसी वकील को नियुक्त कर लेता है, तो वह यह मानकर चलता है कि उसका पक्ष सही तरीके से रखा जाएगा। मुवक्किल से यह कतई उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह हर वक्त वकील की कार्यवाही पर पहरेदार की तरह निगरानी रखे। इसलिए, न्याय के हित में अदालतों को ऐसे मामलों में हमेशा उदार रवैया अपनाना चाहिए।






