कानून-व्यवस्था

हाईकोर्ट; जमीन पर हर जगह नहीं हो सकते काबिज, अधिग्रहण के बाद भी कब्जा बरकरार रखने पर अतिक्रमणकारी कहलाएंगे

बिलासपुर, नई राजधानी विकास प्राधिकरण (एनआरडीए) में स्थित क्रिकेट स्टेडियम के बाजू में खेल ग्राम बनाने 2012 में की गई भूमि अधिग्रहण को चुनौती देते हुए 2016 में दायर की गई याचिका हाईकोर्ट ने खारिज कर दी थी। अब इसे चुनौती देने वाली अपील को भी हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए कहा है कि पंचनामा की प्रक्रिया भूमि पर कब्जा लेने के लिए वैध है। हर कब्जे को फिजिकली नहीं लिया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिग्रहण होने के बाद भी अगर पूर्व भूमि स्वामी कब्जे में हैं, तो वह अतिक्रमणकारी कहलाएगा।

रायपुर के ग्राम परसदा निवासी हेमराज चंद्राकर और प्रकाश निषाद ने हाईकोर्ट में अपील प्रस्तुत कर बताया कि उनकी भूमि का अधिग्रहण किया गया है, लेकिन वे अब भी कब्जे में हैं और उनसे मात्र पंचनामा के आधार पर जमीन कब्जा ले लिया गया है। उनसे की गई भूमि अधिग्रहण वैधानिक नहीं है। इससे पहले सिंगल बेंच ने उनकी याचिका को देरी के आधार पर खारिज कर दी थी। सिंगल बेंच के फैसले को सही मानते हुए हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने अपील खारिज कर दी थी। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए बताया गया कि वे जमीन पर कब्जे में हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा मामले को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में सुनवाई के लिए भेजा। साथ ही निर्देश दिया कि कब्जे के विषय पर भी सुनवाई करते हुए नियमों के अनुसार निर्णय दिया जाए। डिवीजन बेंच में दोबारा सुनवाई हुई। एनआरडीए के अधिवक्ता सुमेश बजाज ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित इंदौर डेवलपमेंट के मामले में निर्णय का हवाला दिया। इसमें पजेशन और भूमि अधिग्रहण किए जाने के बारे में विस्तार से बताया गया है। इस आधार पर डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के फैसले को यथावत रखते हुए अपील खारिज कर दी।

जमीन एनआरडीए को दी गई
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद दिए फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा काबिज जमीन को एनआरडीए को कब्जे में दे दी गई है। कोर्ट ने कहा कि सांकेतिक रूप से पहले ही जमीन एनआरडीए को दी चुकी है। देरी से याचिका दायर की गई, इसलिए इसे नहीं माना जाएगा। छत्तीसगढ़ में नियम बदल चुके हैं, इसलिए भू-अर्जन के लिए एसडीएम को अधिकार है।

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