PROTEST; ‘पहले हमें गोली मारो, फिर बांध बनाओ’, इसलिए 50 सालों से अटकी है बोधघाट परियोजना, आदिवासी कर रहे विरोध

नरेश कुशवाहा

जगदलपुर, छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में 50 साल पुराने बोधघाट हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को फिर से शुरू करने की तैयारी के बीच वहां के आदिवासियों का विरोध तेज हो गया है. प्रभावित गांवों के लोगों ने साफ शब्दों में कहा है कि उनकी जमीन, जंगल और घरों को उजाड़कर किसी भी कीमत पर बांध नहीं बनाया जा सकता है. विरोध प्रदर्शन के दौरान कई ग्रामीणों ने नारे लगाए और फिर कहा कि पहले हमें गोली मारो, फिर बांध बनाओ.

बोधघाट परियोजना का प्रस्ताव कई साल पहले रखा गया था. इस प्रोजेक्ट के तहत बड़ी संख्या में गांवों के डूब क्षेत्र में आने की आशंका है. स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर यह बांध बनता है तो हजारों परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़ेंगे. इसके अलावा खेती की जमीन, जंगल और पारंपरिक आजीविका के साधन भी असर होगा.

दंतेवाड़ा जिले के बारसूर के पास हितलकुडुम गांव में आयोजित एक विशाल महापंचायत में हजारों आदिवासियों ने साफ चेतावनी दी है कि ‘पहले हमें गोली मारो, फिर बांध बनाओ’।इस परियोजना से प्रभावित होने वाले 56 गांवों के निवासियों ने दो टूक कहा है कि वे किसी भी कीमत पर अपनी जमीन, जंगल और सदियों पुराने पवित्र धार्मिक स्थलों को डूबने नहीं देंगे। 18 ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधि इस रैली में अपने पारंपरिक देवी-देवताओं और धार्मिक प्रतीकों के साथ विरोध दर्ज कराने पहुंचे थे।

क्या है बोधघाट परियोजना?

बोधघाट पनबिजली योजना जिले में बारसूर के पास इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित एक जलविद्युत और सिंचाई परियोजना है। इसकी परिकल्पना पहली बार साल 1979 में की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य पूरे बस्तर संभाग में बिजली उत्पादन और सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करना था। हालांकि, बड़े पैमाने पर होने वाले विस्थापन, घने जंगलों के डूबने और पर्यावरण को होने वाले भारी नुकसान के चलते यह प्रोजेक्ट पिछले पांच दशकों से अधर में लटका हुआ था। हाल ही में राज्य सरकार द्वारा इसके व्यवहार्यता परीक्षण के लिए दोबारा सर्वे शुरू करने की खबरों ने बस्तर के इस सबसे पुराने विवाद को फिर से जिंदा कर दिया है।

विनाश की योजना का आरोप

प्रदर्शनकारियों का दावा है कि इस विशाल बांध के बनने से दंतेवाड़ा, बीजापुर, बस्तर और नारायणपुर जिलों के दर्जनों गांव पूरी तरह तबाह हो जाएंगे। अनुमान के मुताबिक, इस परियोजना के कारण 16,000 हेक्टेयर से अधिक की वन भूमि जलमग्न हो जाएगी और हजारों आदिवासियों को बेघर होना पड़ेगा। महापंचायत में शामिल हुए बीजापुर के विधायक विक्रम मंडावी ने सरकार को घेरते हुए कहा कि एक तरफ विकास की बातें हो रही हैं, तो दूसरी तरफ बस्तर को उजाड़ने की तैयारी की जा रही है। उन्होंने दावा किया कि इस परियोजना से 50,000 से अधिक लोग सीधे तौर पर प्रभावित होंगे।

बोधघाट परियोजना से लाभ
दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि बोधघाट परियोजना से क्षेत्र में बिजली उत्पादन बढ़ेगा और विकास को गति मिलेगी. हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि विकास तभी सार्थक होगा, जब उससे प्रभावित होने वाले लोगों की सहमति और हितों का पूरा ध्यान रखा जाए. फिलहाल, परियोजना को लेकर बस्तर में माहौल गर्म है. आदिवासी संगठन और ग्रामीण लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और उन्होंने साफ कर दिया है कि अपनी जमीन और जंगल बचाने के लिए वे हर लेवल पर संघर्ष जारी रखेंगे.

आंदोलन और ग्रामीणों की मांगें

ग्रामीणों ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को एक ज्ञापन सौंपकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं।आरोप है कि PESA कानून और वन अधिकार अधिनियम के तहत बिना ग्राम सभाओं की लिखित सहमति के गुपचुप तरीके से सर्वे का काम दोबारा शुरू कर दिया गया है। बोधघाट संघर्ष समिति ने मांग की है कि जब तक परियोजना की पूरी जानकारी गांवों के साथ साझा नहीं की जाती, तब तक सारा काम तुरंत रोका जाए। आदिवासियों ने पेसा नियम 2022 के तहत संसाधन योजना एवं प्रबंधन समितियों के प्रावधानों को लागू करने की भी मांग उठाई है। आदिवासियों के मुताबिक यह सिर्फ जमीन या मुआवजे का मुद्दा नहीं है, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और पुरखों की विरासत को बचाने की लड़ाई है।

  • Narayan Bhoi

    Narayan Bhoi is a veteran journalist with over 40 years of experience in print media. He has worked as a sub-editor in national print media and has also worked with the majority of news publishers in the state of Chhattisgarh. He is known for his unbiased reporting and integrity.

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