भारतीय फिल्मों के सूत्राधार; दादा साहेब फाल्के

 एडमंड हिलेरी औऱ सुनील गावस्कर दुनियां में दो ऐसे व्यक्तित्व है जिनके पास क्रमशः एवरेस्ट में चढ़ने औऱ टेस्ट क्रिकेट में पहले पहल दस हज़ार रन बनाने का कीर्तिमान है। इनके बाद न जाने कितने एवरेस्ट चढ़ गए और कितनो ने टेस्ट में  दस हज़ार बना लिए लेकिन  एडमंड हिलेरी और सुनील गावस्कर का नाम अजर अमर है। दंगल फिल्म में महावीर फोगाट बने आमिर खान का एक डायलॉग आज भी कानो में गूंजता है कि एक नंबर को ही याद किया जाता है।

 भारतीय जनमानस के मनोमस्तिष्क में फिल्म की अपनी महत्ता है। ये मान ले कि नसों में लहू के साथ फिल्में भी दौड़ती फिरती है।  हमारे जीवन शैली में फिल्मों की महत्वपूर्ण प्रभाव है। इस प्रभाव  की शुरुआत की भी अपनी कहानी है।

 उन्नीसवी शताब्दी के प्रारम्भ में विदेशों में फिल्में बनने लगी थी। देश मे अंग्रेजो का शासन था तो वे मुम्बई के  इकलौते थिएटर वाटसन होटल में अंग्रेजी भाषा की एकात फिल्म लगा लेते थे।

 दादा साहब फाल्के ने ईसा मसीह पर बनी फिल्म देखी तो उनको लगा कि रामायण औऱ महाभारत ग्रंथ में अनेकानेक चरित्र है जिनको फिल्मांकित किया जा सकता है। जे जे आटर्स स्कूल के प्रोडक्ट थे फाल्के  उन्होंने जहमत उठाई और एक ऐसे भगीरथ प्रयास में खुद को उलझा दिया जिसकी परिणीति के रूप में पहली मूक फिल्म राजा हरिश्चंद्र ने जन्म लिया। उस काल मे नायिका नही मिला करती थी सो फाल्के रेड लाइट एरिया में भी गए लेकिन बात नही बनी तो अपने रसोइया अन्ना सालुंके को  पुरुष और स्त्री के चरित्र में अभिनय करवाया।  जुनून किसे कहते है ये दादा साहेब फाल्के से सीखना चाहिए फिल्मों के निर्माण के हर क्षेत्र में उनको अपना दम दिखाना पड़ा इस युद्ध मे उनकी एक आंख की रोशनी चली गयी लेकिन देश के करोड़ो लोगो की दो आंखों को सिनेमा का चस्का लगाने का श्रेय भी उनके खाते में गया। फिल्म निर्माण में मूक फिल्मों की अनवरत पंचायन्वे  प्रस्तुति फाल्के के नाम रही। 

उनके कर्ज़ को कैसे चुकाया जाए इसके लिए सरकार ने दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की घोषणा कर रखी है।  मनोरंजन की दुनिया मे फिल्मों के माध्यम से  दीर्घ सेवा करने वालो को ये पुरस्कार सालाना दिया जाता है। आज के ही दिन दादा साहेब फाल्के ने जन्म लिया था सो उनको याद इसलिए करना जरूरी है कि अगर हम आज फिल्म देख रहे है तो इसके मजबूत बुनियाद के रूप में दादा साहेब फाल्के है। भारतीय फिल्मों के सबसे बड़े यथार्थ फिल्म बनाने वाले सत्यजीत रे ने दादा साहेब फाल्के की जिंदगी में पाथेर पांचाली फिल्म बनाई थी। इसे देखकर तत्समय की परेशानी को समझा जा सकता है।

स्तंभकार -संजयदुबे

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