HC;समाज में महिलाओं के प्रति सोच बदलने की जरूरत…सुप्रीम कोर्ट ने कहा-उन्हें आजाद छोड़ दें

0 सुप्रीम कोर्ट ने देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर जताई चिंता

नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की और समाज में महिलाओं के प्रति सोच में बदलाव की आवश्यकता पर जोर दिया। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा कि महिलाओं को स्वतंत्र रूप से जीने दें। हमारा आग्रह है कि महिलाओं को स्वतंत्र छोड़ दें। हमें उनके चारों ओर हेलीकॉप्टर की तरह निगरानी करने की आवश्यकता नहीं है, उन्हें बढ़ने दें, यही इस देश की महिलाएं चाहती हैं।

‘महिलाओं को स्वतंत्र छोड़ दें’

बेंच ने ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों की कमी के कारण महिलाओं को खुले में शौच के लिए जाने की मजबूरी पर चिंता जताई। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि गांवों में, स्वच्छ भारत अभियान के बावजूद, कई जगहों पर अभी भी बाथरूम और शौचालय नहीं हैं। महिलाओं को अपनी जरूरतों के लिए शाम तक इंतजार करना पड़ता है क्योंकि वे दिन में खुले में नहीं जा सकतीं और हमने ऐसे मामले देखे हैं।

जस्टिस नागरत्ना ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए बहुआयामी जागरूकता अभियान की आवश्यकता पर बल दिया। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि चाहे शहरों में हों या ग्रामीण क्षेत्रों में, महिलाओं की असुरक्षा को पुरुष कभी नहीं समझ सकते। एक महिला जब सड़क, बस या रेलवे स्टेशन पर कदम रखती है, तो अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने की निरंतर चिंता उसके मानसिक बोझ को बढ़ाती है, जो उसके घरेलू, कार्यस्थल और सामाजिक जिम्मेदारियों के अलावा होता है। हर नागरिक को सुरक्षित होना चाहिए, लेकिन यह अतिरिक्त बोझ महिलाओं को उठाना पड़ता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर केंद्र ने दिया अपडेट

केंद्र सरकार ने अदालत को सूचित किया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) उपलब्ध है, लेकिन नैतिक शिक्षा और लैंगिक संवेदनशीलता से संबंधित विस्तृत पाठ्यक्रम और शैक्षणिक मॉड्यूल अभी प्रस्तुत किए जाने बाकी हैं। इस पर, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शैक्षणिक सत्र पहले ही शुरू हो चुका है और इस मामले में अनिश्चितकाल तक देरी नहीं की जा सकती।

अदालत ने केंद्र को दिया तीन हफ्ते का वक्त

अदालत ने केंद्र को तीन सप्ताह का समय दिया है ताकि वह एक व्यापक हलफनामा दाखिल कर यह बताए कि वर्तमान में कौन से मॉड्यूल मौजूद हैं और आगे क्या कदम उठाए जाएंगे। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 6 मई को निर्धारित की है। सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ए. हर्षद पोंडा द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों, विशेष रूप से यौन उत्पीड़न और बलात्कार, के मुद्दों को मूल्य-आधारित शिक्षा और सार्वजनिक जागरूकता पहल के माध्यम से उठाया गया था।

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