POLITICS; छत्तीसगढ की सियासत ‘कही-सुनी’

रवि भोई

छत्तीसगढ़ के माथे से मिटता दाग

नक्सल समस्या के कारण छत्तीसगढ़ का विकास तो प्रभावित हो ही रहा था। इस समस्या के कारण देश में छत्तीसगढ़ की पहचान समस्याग्रस्त राज्य की बन गई थी। आए दिन नक्सलियों के उत्पात के कारण लोग छत्तीसगढ़ आने में भी भय खाते थे। पिछले डेढ़ साल में नक्सलियों के सफाए के लिए जिस तरह अभियान चला और सफलता मिली यह काबिले तारीफ़ है। नक्सलियों के खात्मे में सफलता राज्य की विष्णुदेव साय सरकार की बड़ी उपलब्धि है। पिछले दिनों छत्तीसगढ़ और तेलंगाना सीमा पर कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों में सुरक्षा बलों ने जिस तरह नक्सलियों के पनागाह को नेस्तनाबूत किया, उससे तो राज्य में नक्सलियों की कमर ही टूट गई। संयुक्त मध्यप्रदेश रहते और अलग राज्य बनने के बाद बस्तर से नक्सलवाद को समाप्त करने के लिए लगातार कोशिशें होती रही हैं। इस कोशिश में कई जवान शहीद हुए। नक्सलियों ने मुखबीरी के आरोप में कई बेगुनाहों की जानें भी लीं। अब लगता है कि डेढ़ साल के आपरेशन में छत्तीसगढ़ से नक्सलियों के ताबूत पर कील ठोंक दी गई है। नक्सली सिर नहीं उठा पाएंगे और छत्तीसगढ़ पर नक्सल प्रभावित राज्य होने का दाग भी मिट जाएगा। नक्सली शांति वार्ता की बात कर रहे हैं, इसका मतलब साफ़ है कि वे कमजोर हो गए हैं और सुरक्षाबलों के आगे टिक नहीं पा रहे हैं।

मंत्री और कलेक्टर के बीच तकरार

कहते हैं कि छत्तीसगढ़ के एक कैबिनेट मंत्री की एक कलेक्टर से तकरार हो गई। चर्चा है कि पिछले दिनों केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के मुख्य आतिथ्य में आयोजित एक कार्यक्रम में स्वागतकर्ताओं की सूची में मंत्री जी का नाम ही नहीं था। बाद में भूल सुधार की गई, लेकिन बात का बतंगड़ बन ही गया। शिवराज सिंह का कार्यक्रम जिस संभाग मुख्यालय में आयोजित किया गया था, मंत्री जी उसी संभाग से आते हैं, फिर भी स्वागतकर्ताओं में मंत्री जी का नाम न होना, सबको आश्चर्य हुआ। मंत्री जी को भी ऐसी उपेक्षा की उम्मीद नहीं थी। मंच पर मौजूद मंत्रियों और अन्य नेताओं का नाम स्वागत के लिए पुकारा गया ,पर मंच में मौजूद रहने के बाद भी मंत्री जी को नहीं पुकारा गया। गलती का अहसास होने पर आखिर में स्वागत के लिए मंत्री का नाम पुकारा गया, पर मंत्री जी को यह चुभ गया। बताते हैं कि कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मंत्री जी ने जिले के कलेक्टर साहब को चूक के लिए फटकार लगाई। जानकारों का कहना है कि दोनों में गर्मागर्म बहस भी हुई। खबर है कि मंत्री जी की फटकार से खफा कलेक्टर ने घटना की शिकायत अपने उच्चाधिकारियों से की। बताते हैं उच्चाधिकारियों ने कलेक्टर साहब को ढांढस बंधाया है। वैसे कलेक्टर को अपने सुर में चलने वाला बताया जाता है। अब देखते हैं आगे क्या होता है, पर इस घटना की बड़ी चर्चा है।

भारतमाला के जाल में उलझे आईएएस

कहते हैं कि छत्तीसगढ़ के एक आईएएस अफसर भारतमाला परियोजना के जाल में बुरी तरह उलझ गए हैं। चर्चा है कि आईएएस अफसर ने एक संस्था की जमीन को अपने नाम रजिस्ट्री करवाकर मुआवजा ले ली थी। भारतमाला परियोजना में गड़बड़ी की जांच होने और कुछ लोगों के जेल जाने के बाद आईएएस की भी नींद हराम हो गई है। बताते हैं कि आईएएस ने अब जाँच से बचने के लिए संस्था को जमीन लौटने के लिए तैयार हो गए हैं। खबर है कि भारतमाला परियोजना में फायदा लेने के लिए एक महिला आईएएस अफसर ने अपने कुछ रिश्तेदारों के नाम से जमीन खरीदी थी। बताते हैं कि रिश्तेदारों के नाम पर मुआवजा की राशि भी मिल गई है। चर्चा है कि जांच एजेंसियां भारतमाला परियोजना की गड़बड़ी की तह तक पहुंचने में जुट गई हैं। कहा जा रहा है जिस तरह के खुलासे हो रहे हैं उससे लग रहा है कि भारतमाला परियोजना में पूरी दाल ही काली नजर आ रही है।

गौतम के पूर्णकालिक डीजीपी बनने के आसार

कहा जा रहा है कि 1992 बैच के आईपीएस अरुणदेव गौतम छत्तीसगढ़ के पूर्णकालिक डीजीपी बन सकते हैं। गौतम अभी कार्यवाहक डीजीपी हैं। बताते हैं पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के पूर्णकालिक डीजीपी के लिए यूपीएससी में बैठक हुई। इसमें छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव अमिताभ जैन भी शामिल हुए थे। यूपीएससी की बैठक की कार्यवाही का विवरण अभी राज्य शासन को नहीं भेजा गया है। माना जा रहा है कि अगले हफ्ते तक कार्यवाही का विवरण आ जाएगा। बताते हैं कि यूपीएससी छत्तीसगढ़ के नए डीजीपी के लिए तीन अफसरों का पैनल भेजेगा। पैनल में से एक नाम का चयन राज्य सरकार को करना है। अरुणदेव गौतम अभी प्रभारी डीजीपी हैं , इस कारण उनके पूर्णकालिक डीजीपी बनने के संभावना ज्यादा है। चर्चा है कि डीजीपी के पैनल में 1992 बैच के अफसर अरुणदेव गौतम और पवनदेव के अलावा 1994 बैच के अफसर जीपी सिंह का नाम हो सकता है। 1994 बैच के अफसर हिमांशु गुप्ता डीजीपी की दौड़ से बाहर बताए जा रहे हैं।

डीजी का एक पद सृजित करने यूपीएससी को प्रस्ताव

खबर है कि छत्तीसगढ़ में डीजी का एक पद सृजित करने के लिए राज्य सरकार यूपीएससी को प्रस्ताव भेजने की तैयारी में है। बताते हैं कि इस पद के विरुद्ध 1994 बैच के आईपीएस हिमांशु गुप्ता की पदस्थापना होनी है। हिमांशु गुप्ता डीजी के पद पर पदोन्नत हो चुके हैं, लेकिन 1994 बैच के आईपीएस जीपी सिंह की सेवा में बहाली और डीजी के पद पर पदोन्नत होने के बाद हिमांशु गुप्ता का नाम वरिष्ठता सूची में नीचे हो गया। वर्तमान में डीजी के तीन पद के विरुद्ध अरुणदेव गौतम, पवनदेव और जीपी सिंह हैं। बताते हैं राज्य के गृह विभाग ने हिमांशु गुप्ता के लिए डीजी का पद निर्मित करने का प्रस्ताव वित्त विभाग को भेजा था। वित्त विभाग ने यूपीएससी से अनुमति के बाद पद सृजित करने की अनुशंसा की है। इसके बाद अब गृह विभाग डीजी का एक पद सृजित करने के लिए यूपीएससी को प्रस्ताव भेजने की तैयारी में है।

टीवी चैनल में मंत्री जी का निवेश

चर्चा है कि राज्य के एक मंत्री जी को मीडिया का चस्का लग गया है। खबर है कि मंत्री जी ने एक रीजनल चैनल में कुछ इन्वेस्टमेंट किया है। अब मंत्री जी कितने नफे-नुकसान में रहते हैं, यह तो समय ही बताएगा ? मंत्री जी पहली बार विधायक बने हैं और उनके पास कमाई वाले विभाग भी हैं। इस कारण आमदानी को कहीं न कहीं तो खपाना पड़ेगा ही। आमतौर पर मीडिया में उद्योगपतियों के इन्वेस्टमेंट की खबरें आतीं हैं। पहली दफा मंत्री के मीडिया में निवेश की चर्चा सामने आई है। वैसे कुछ नेता-विधायकों के इन्वेंस्टमेंट राजधानी के अस्पतालों में होने की भी खबर है। कहते हैं मंत्री जी ने जिस चैनल में पैसा लगाया है, अभी वह दो राज्यों में चल रहा है।

एक एचओडी से परेशान मातहत

कहते हैं पढ़ने-पढ़ाने वाले विभाग के एक एचओडी से उनके मातहत बड़े परेशान हैं। एचओडी साहब के बारे में चर्चा है कि न तो आपने मातहतों से ठीक से बात करते और न ही उनकी समस्याओं का समाधान करते। न तो वे उम्र का ख्याल रखते और न ही पद का और मातहतों को फटकार लगाने लग जाते हैं। अफसर महोदय को एचओडी बने ज्यादा दिन हुए नहीं हैं, पर स्टाफ के लोग उनके कामकाज और तौर-तरीके से असहज महसूस करने लगे हैं। एचओडी साहब के पास कई चार्ज होने से मातहतों को उनके आने का इंतजार भी करते रहना पड़ता है। अब देखते हैं मातहतों का गुस्सा फूटता है या साहब बदलते हैं?

(लेखक पत्रिका समवेत सृजन के प्रबंध संपादक और स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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