फिल्मों को भारतीय दर्शकों के धडकनों का स्पंदन कहा जाए तो अनुचित नहीं होगा। मनोरंजन का चलता फिरता माध्यम फिल्मे है। एक सौ आठ साल से मूक और फिर सवाक होकर अनवरत दर्शकों को हंसाती
रुलाती क्रोधित करते आ रही है फिल्मे। देश, विदेश, स्थान विशेष के अलावा समाज, परिवार में घटते घटनाक्रमों का ब्यौरा ही है तो फिल्मे। ये भी कह सकते है कि फिल्मे आइना है हमारी व्यवस्था की।
समय काल के साथ साथ फिल्मों ने भी अपना चाल, चेहरा और चरित्र को बदला है। सौ साल पहले धार्मिक विषयों पर फिल्म बनी तो आगे के समय में पारिवारिक फिल्मों ने रंग जमाया। मसाला फिल्मों का भी दौर आया तो यथार्थ फिल्मों ने भी जन्म लिया। दुनिया में माफिया और गैंगस्टर विषय ने धाक जमाई तो देश में हिंसात्मक फिल्मों का भी स्थाई दौर आया।
इस दौर में एक आदर्श कि “लोहा, लोहे को काटता है” को लेकर बुराई को खत्म करने के लिए बुरे व्यक्तियों के सदुपयोग की कहानियों ने फिल्मों का रूप लिया।
“शोले” इस कड़ी की पहली ज्यादा हिंसात्मक फिल्म थी जिसमें हिंसा को सामाजिक स्वीकृति देने की सफल कोशिश की गई थी। सामूहिक नर संहार के अलावा अंग विच्छेदन सहित क्रूरता बड़े पैमाने पर दिखाया गया था। डाकू गब्बर सिंह के द्वारा बदला लेने का तरीका मनो मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालने वाला रहा। उस दौर में सेंसर बोर्ड पर प्रश्न भी लगा था कि फिल्मे, समाज को क्या दिखाना, बताना चाह रही है।
” द बेंडिट क्वीन” समाज के बदसूरत तस्वीर का फिल्मांकन था जिसमें हिंसा को शारीरिक रूप के अलावा शाब्दिक रूप से भी चित्रित किया गया था। हिंसा, दर्शकों को आनंदित करने लगी थी। खलनायकों का जितना दुर्दांत होता उतना ही दर्शक खुश होने लगा। अमिताभ बच्चन तो एंग्री यंग मैन ब्रांड ही बन गए।
वक्त के साथ हिंसा फिल्मों का अनिवार्य हिस्सा बन गई। माफिया, गैंगवार विषयों पर फिल्मे बनती गई।
कोरोना काल के दौर में ओटीटी फिल्मों में हिंसा का विद्रूप रूप देखने को मिला।”गैंग ऑफ वासेपुर” में गाली और हत्या का जो चित्रण हुआ वह सच तो था लेकिन वास्तविक जीवन में स्वीकार्य नहीं था क्योंकि ये फिल्म कानून व्यवस्था का मजाक उड़ाते दिखती थी। “एनिमल” फिल्म में भी हिंसा, उग्र रूप धारण किए हुए थी।
वर्तमान दौर में आदित्य धर की दो किश्तों में बनी फिल्म धुरंधर की बड़ी चर्चा है। 443 मिनट याने 7 घंटे 23 मिनट दो किश्तों में बनी कुल जमा फिल्म है। “धुरंधर” और “धुरंधर द रिवेंज “शीर्षक की फिल्म आर्थिक सफलता के झंडे गाड़ रही है। 1991 से लेकर 2018 तक घटी वे घटनाएं है जिनमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान या पाक समर्थित व्यक्तियों द्वारा हिंदुस्तान में अस्थिरता के घटनाओं को फैलाने वाले “चैप्टर” है।
ये तो तय है कि जिस कालखंड को लेकर धुरंधर फिल्म बनी है वे देश के सच्चे नागरिकों के मन में पाकिस्तान के प्रति घृणा को निश्चित रूप से इजाफा करने वाली रही है। दाऊद का काला साम्राज्य हो या हिंदुस्तान के विमान का अपहरण हो या देश के संसद पर हमला हो या मुंबई में 26/11 की घटना हो या पंजाब को नशे में झोंकने की बात हो या फिर देश की राजनीति को नकली नोट से प्रभावित करने की घटना हो।सबसे बड़ी बात कि देश के भीतर के गद्दारों सहित उनको संरक्षण देने वाले राजनीतिज्ञों पर धुरंधर तीव्र प्रहार है। जिसके चलते इस फिल्म को “प्रोपेगेंडा” भी माना जा रहा है।
आदित्य धर उरी: द स्ट्राइक से समझ चुके थे। इसी समझ को आगे बढ़ते हुए उन्होंने आर्टिकल 370 बनाया और अब हिंसा के अतिरेक को लेकर सामने आए।
फिल्म के दूसरे भाग के शुरुवात में बात समझ में आ जाती है कि राजनीति का प्रभाव कानून को निरीह बना देता है और फिर देश के लिए बंदूक उठाने वाले को समाज के भीतर बैठे ऐसे लोग जो राजनीति के जरिए अपने पुरुषार्थ का नंगा नाच दिखाते है उनके अंत के लिए एक व्यक्ति हथियार उठाने के लिए मजबूर हो जाता है।
हिंदुस्तान के भीतर पाकिस्तान के द्वारा एक के बाद एक आक्रमण से निपटने के लिए तय ये होता है कि दुश्मन को दुश्मन के ही तरीके से ही निपटाया जाए। इसी को लेकर धुरंधर का जन्म होता है। जसकीरत सिंह रंगी के हमज़ा अली मजारी बनने की कहानी शुरू होती है। (शोले और कर्मा फिल्म को याददाश्त में रखे रहिए)।
धुरंधर की दोनों किश्तों में हिंदुस्तान के साथ साथ पाकिस्तान की भी नींव को राजनीति के तवे पर सेकते
दिखाया गया है।जाहिर तौर पर पाकिस्तान में किसी भी पार्टी की सरकार बने उसका
हिंदुस्तान विरोधी होना अनिवार्य है, ये साहस देश राज्यो की सरकारे नहीं दिखा पाई। उल्टा अपने ही शासनकाल में ढुलमुल रहकर देश को कायर बनाने में में खड़े हो गए। यही बाते “प्रोपेगेंडा” दिख रही है।
सच्चाई ये भी है कि दोनों धुरंधर में हिंसा अपने चरम पर है। आधुनिकतम हथियारों से सज्जित नायक खलनायक, युद्ध सा माहौल खड़ा करते दिखते है। हत्याएं क्रूरतम तरीके से होते देखी जाती है जो मन में वितृष्णा को जन्म देती है। देश का सेंसर बोर्ड अनेकों बार निरीह दिखा है, इस बार भी सही।
देशभक्ति के तड़के में सारे गुनाह माफ किए जाते है। वैसे भी पाकिस्तान की दोगलेपन को हिंदुस्तान का बच्चा बच्चा जानता है।पड़ोस में रहते है गुदा का जितना दम लगा सकते हो लगा लेना, जैसे संवाद दर्शकों के कान को बुरे लगते है लेकिन मृत्यु के डर से भारत माता की जय सुनते है तो सीटी भी बजती है और तालियां भी।
धुरंधर की दोनों किश्तों में अभिनय किए सभी छोटे कलाकारों ने बड़े कलाकारों से समक्ष या साथ में शानदार यादगार अभिनय किया है।(शोले की याद ताजा कर सकते है)। फिल्म में दृश्यों के साथ पुराने गानों का सम्मिश्रण करने वाले संगीतकार शाश्वत सचदेव की सराहना करनी पड़ेगी जिन्होंने ए आर रहमान के बाद संगीत को नये आयाम दिए है। जास्मिन सैंडल्स हिंदुस्तान और अमरीका भूमि की सम्मिश्रण है, उन्हें भी धुरंधर ने पहचान दी है। रणवीर सिंह ने पीरियाडिक फिल्म बाजीराव मस्तानी, और पद्मावत में वे सिद्ध कर चुके है कि उनके भीतर एक मेहनती कलाकार छिपा हुआ है। धुरंधर इस बात पर मोहर लगाता है।
– संजय दुबे-




