FILM; मुसाफिर कैफे.. एक सार्थक सच

एक पुस्तक और उस पर बनी फिल्म या धारावाहिक में बहुत फर्क होता है ये बात तीसरी कसम और  फणीश्वर नाथ रेणु के द्वारा लिखी मारे गैर गुलफाम और गो दान को पुस्तक के रूप में पढ़ने और फिल्म के देखने में समझ में आ गया था। 
मुसाफिर कैफे को धारावाहिक के रूप में पहले दर्शक कम श्रोता बन ज्यादा सुना। एक लेखक होने के नाते श्रोता होना दर्शक होने से ज्यादा बेहतर लगता है।  धारावाहिक के पूर्ण होने पर महसूस हुआ कि मुसाफिर कैफे को पढ़ भी लेना चाहिए। सो  ऑन लाइन मुसाफिर कैफे ऑर्डर करने पर दूसरे ही दिन सामने थी। एक दिन लगा पढ़ने में, 2016  का मुसाफिर कैफे  का भ्रूण मुंबई की जगह भोपाल  में जन्म लेते दिखा।मसूरी, मसूरी में ही रही मतलब एक बदलाव के साथ।  सुधा और चंदर के बाद पम्मी का प्रीति बनना  शायद धारावाहिक की मांग रही होगी। चौथे किरदार के रूप में एक लेखक का सृजन धारावाहिक में उत्सुकता को बढ़ाने के बजाय  मुसाफिर कैफे की कल्पना को हकीकत के रूप में साकार करने की ईमानदारी ज्यादा दिखी।
मुसाफिर कैफे के अधिकांश पात्र 1990 के आसपास के जन्मे  हुए दिखे। ये वो दौर था जब देश में इंग्लिश मीडियम के साथ साथ co education व्यवस्था की नींव सार्वभौम हो रही थी। इसी पीढ़ी के लिए प्यार और सेक्स के बीच कुछ ज्यादा अंतर न होने का विचार भी पुख्ता होते गया।इसी वजह से मुख्य रूप से तीनों पात्र के पास दोनों अनुभव का होना दिखा।
एक लेखक समकालीन परिस्थितियों से पलायन नहीं कर सकता , ये मुसाफ़िर कैफे से पुनः समझ में आई।
मुसाफिर कैफे 143 पृष्ठ पर  अर्ध विराम लेते दिखाई देती है क्योंकि कहानियां कभी खत्म नहीं होती है।
अमूमन फिल्मों या धारावाहिकों के दर्शक परंपरागत रूप से सुखद अंत  की प्रत्याशा में दर्शक बनते है।एक युवती नीली फिल्म भी इसी उम्मीद से पूरा देख लेती है कि अंत में नायक , नायिका से शादी कर लेगा।

😛

मैने मुसाफिर कैफे देखने की सलाह अपने कई पुरुष और महिला म मित्रो को  दिया और उनसे गुजारिश भी किया कि धारावाहिक की शुरुआत करने और  अंत देखने के बाद बताना जरूर कि शुरुआत में तुम्हारी अंत की उम्मीद क्या थी?   इंस्टाग्राम में एक सर्वे देखकर मैं अपने विचार से पुख्ता हुआ कि आम दर्शक  ले दे कर  चन्दर की शादी प्रीति से या सुधा से करवा कर ही मानेगा।
बात से पहले की बात से लेकर दो साल बाद तक  कभी रेंगती, कभी रुकती, कभी भागती कभी लड़खड़ाती कभी खत्म होते दिखती मुसाफिर कैफे, जिंदगी के समान ही दिखाई, unpredictable, यही इस उपन्यास की खूबी है जो पाठकों को अगली पंक्ति तक सफर करने के लिए मजबूर करती है। ये कहते हुए कि  ” जिंदगी को  सही में समझने के लिए किताबें ही नहीं  बाते भी पढ़नी पड़ती है”।
मुझे मुसाफिर कैफे  पढ़ने में उम्दा लगी, बिना किसी  झूठ के ये सच लिख रहा हूं। जो बाते मन को, मस्तिष्क और दिल को।अच्छी लगी उन्हें शब्दत:
उतार रहा हूं
” इतना तय है कि बोलकर अक्सर लोग छूने से भी ज्यादा पास आ जाते है।”पृष्ठ 7)
“कहानी लिखने की सबसे बड़ी कीमत लेखक यही चुकाता है कि कहानी लिखते लिखते एक दिन वो खुद कहानी हो जाता है।”पृष्ठ 8)
“कहानियां झूठ नहीं होती। या तो वो हो चुकी होती है या वो हो रही होती है या फिर होने वाली होती है।”पृष्ठ 8)
” फिल्म वाले बहुत खोखले होते है और उससे भी ज्यादा उनकी खबरें।”पृष्ठ 29)
“जब भी confusion हो कि ये काम करना चाहिए  या नहीं करना चाहिए या फिर कोई बात बोलनी चाहिए या नहीं चाहिए तो बस बिना कुछ सोचे समझे वो काम करके देख लेना चाहिए।”पृष्ठ 31)
“पूरी जिंदगी पता नहीं क्या कमाने के फिक्र में हम समझ ही नहीं पाते कि बचाना क्या है और बेचना क्या है। “( पृष्ठ 40)
“अगर जिंदगी को हटाकर देखो तब कुछ अधूरा रह जाता है और अगर जोड़ दो तो भी कहानी पूरी नहीं बनती।”(पृष्ठ 57)
  “बाहर से हमारी लाइफ जितनी परफेक्ट दिखती है उतनी होती नहीं परफेक्ट लाइफ भी कोई लाइफ़ हुई।” (पृष्ठ 69) प्रकाशक ने पृष्ठ संख्या चिपकाना भूल गया।”

😷

“लाइफ़ की कोई मिनिंग नहीं होती उसमें कोई मिनिंग डालना पड़ता है।कभी अपने पागलपन से तो कभी अपने सपने से।”( पृष्ठ 75)
हम सब अपनी बोरियत मिटाने के लिए जिंदा है।जिस दिन बोरियत मिटाते मिटाते थक जाते है उस दिन हम मर जाते है।”(पृष्ठ 75)
“इस नई दुनियां से हमें फुर्सत नहीं है और उस दुनियां में कदम रखने की पहली शर्त है  फुर्सत।”(पृष्ठ 79 )
“जो दिन तेजी से बीत जाते है,वो अच्छे होते है।” ( पृष्ठ 81)
“शादी वादी इस दुनियां का सबसे बड़ा शो ऑफ है।” ( पृष्ठ 89)
“जब आदमी अंदर से खाली होता है तो आत्मा परमात्मा की बाते कितनी बकवास लगती है।”(पृष्ठ 93)
“गूगल मैप्स से चलने वाले अक्सर गलत मोड ले लेते है।”(पृष्ठ 94)
” हमारी जिंदगी के कई असली केवल इसलिए असली है क्यूंकि वे अभी तक नकली साबित नहीं हुए है।”( पृष्ठ 95)
“दुनियां की तमाम चीजों में से जिनका आप भरोसा नहीं कर सकते उनमें से एक मसूरी का मौसम भी है।”(पृष्ठ 97)
“अगर जिंदगी के पते पर पहुंचना इतना आसान होता तो जिंदगी की औकात  दो नंबर के GK के सवाल भर की होती।” (पृष्ठ 99)
“प्रत्येक व्यक्ति अपनी जीवनी लिखने लगे तो संसार में  सुंदर पुस्तकों की कमी न रहे।”(पृष्ठ 100)
” जिसके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता वो फैसले जल्दी लिया करते है।”(पृष्ठ 108)
शादी by design थोड़ी बोरिंग होती है।शादी के बोरिंग होने में दोनों लोगों की कोई गलती नहीं होती it’s design fault you know ।(पृष्ठ 114)
“पैसे के पीछे  कितना भी भाग ले पैसा पलट के आपको गले नहीं लगा सकता।इसलिए शायद  दुनिया की  सारी दौलत की औकात अक्सर ही एक गले लगने से मिलने वाली खुशी के सामने बड़ी टुच्ची पड़ जाती है।”पृष्ठ 122)
इन पंक्तियों में  मैं खुद  जिंदगी का मुसाफिर रहा। कितनी बार सुधा, चंदर और प्रीति के साथ काफी पिया, उनके साथ यात्रा की
आपको एक शानदार, बेमिसाल, पठनीय और सामयिक उपन्यास लेखन की बधाई,
संजय दुबे 

  • Narayan Bhoi

    Narayan Bhoi is a veteran journalist with over 40 years of experience in print media. He has worked as a sub-editor in national print media and has also worked with the majority of news publishers in the state of Chhattisgarh. He is known for his unbiased reporting and integrity.

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