रायपुर, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को एक बड़ा झटका देते हुए साइंस एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल के 8 कर्मचारियों की बर्खास्तगी को सिरे से खारिज कर दिया है। जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने साफ कहा कि किसी भी कर्मचारी को बिना सुनवाई और उचित जांच के नौकरी से निकालना न केवल गैर-कानूनी है, बल्कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी भी है।
दरअसल, यह पूरा विवाद साल 2012 से शुरू हुआ था। भोजेश्वर चंद्राकर, भूपेश कुमार निषाद और अशोक गायकवाड़ समेत 8 लोगों की नियुक्ति कलेक्टर दर पर भृत्य के पद पर हुई थी। दो साल का प्रोबेशन खत्म होने के बाद जब इन्होंने नियमितीकरण की मांग की, तो अफसरों ने राहत देने के बजाय उनके वेतन में ही कटौती कर दी। मामला जब हाईकोर्ट पहुंचा, तो कोर्ट ने वेतन कटौती को गलत बताते हुए अफसरों को नियमितीकरण पर विचार करने को कहा था।
अफसरों की मनमानी पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हैरानी की बात यह है कि कोर्ट के आदेश के बाद अफसरों ने प्रक्रिया सुधारने के बजाय, नियुक्ति में ही खामियां निकाल दीं और साल 2020 में इन सभी को नौकरी से बाहर कर दिया। मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अब कड़े शब्दों में कहा कि अधिकारी यह साबित करने में नाकाम रहे कि कर्मचारियों ने धोखाधड़ी से नौकरी पाई थी। नियमित होने के बाद कर्मचारियों को संविधान के अनुच्छेद 311 (2) के तहत सुरक्षा मिलती है, जिसे नजरअंदाज किया गया। 6-7 साल की सेवा के बाद किसी को भी बिना विधिसम्मत प्रक्रिया के इस तरह असुरक्षित नहीं छोड़ा जा सकता।
वकीलों ने रखी मजबूती से दलील
कर्मचारियों की ओर से अधिवक्ता तारेंद्र कुमार झा, विनय पांडेय, रवि कुमार भगत और भास्कर झा ने पैरवी की। उन्होंने कोर्ट को बताया कि कैसे शासन ने 21 सितंबर 2020 और 17 मार्च 2021 को मनमाने आदेश जारी कर गरीब कर्मचारियों का हक छीना था। कोर्ट ने इन दोनों आदेशों को निंदनीय और मनमाना मानते हुए निरस्त कर दिया है।







