‘काले धन का चुनावी-चंदा – देश का बना चुनावी धंधा‘
इंजीनियर तपन चक्रवर्ती
गरीबों की सुनों वह तुम्हारी सुनेगा। तुम एक पैसा दोगे, तो वह दस लाख देगा। यह फिल्मी गाना को महानगर के लोकल-ट्रेनों में गरीब-दंपत्ति द्वारा सुरिली-स्वर में गाते हुए मिलते है। इस गाने में गरीब-दंपत्ति को पैसों के साथ-साथ सहानुभूति भी खूब मिलती है। कमोवेश यही स्थिति देश के राजनैतिक-दलों की है। उद्योगपतियों से राजनैतिक-दलों को नोट और जनता से वोट के गंदे खेल से ‘‘देश का चुनाव‘‘ सिर्फ व्यवसायिक धंधा बन गया है। फर्क बस इतना है कि, बाद में विजयी राजनैतिक दल, धंधेबाज एवं तानाशाह शासक बन कर जनता पर क्रुरतापूर्वक शासन करने का नियम बना लेते हैं।
15 फरवरी 2024 को उच्चतम न्यायालय के 05 विद्वान न्यायधिशों की संवैधानिक पीठ द्वारा ‘‘इलेक्ट्रोल-बाँड‘‘ को असंवैधानिक बताते हुए, इसकी बिक्री पर तत्काल रोक लगाते हुए, भारतीय स्टेट बैंक को बेचे गये ‘‘इलेक्ट्रोल-बाँड‘‘ से जुड़ी सभी जानकारियां को 06 मार्च 2024 को उच्चतम न्यायालय में जमा करने के अलावा 13 मार्च 2024 तक अपने वेब-साइड में प्रदर्शन करने का ऐताहासिक निर्णय दिया गया हैं। इसकी सुनवाई 31 अक्टूबर 2023 को संवैधानिक पीठ के पांच विद्वान न्यायाधीश संजीव खन्ना, बी.आई. गवई, जे.वी. पारदीवाला और मनोज मिश्रा के अलावा मुख्यन्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचुड की अध्यक्षता में लगातार 03 दिनों तक सुनवाई होने पर फैसला को रोक दिया गया था। जिसे 15 फरवरी 2024 को रूका हुआ फैसला को उच्च्तम न्यायालय द्वारा सुनाई गई हैं।
देश में ‘‘इलेक्ट्रोन-बाँड‘‘ का प्रस्ताव 20217 के केंद्रीय बजट सत्र के दौरान पूर्व वित्त मंत्री अरूण जेटली द्वारा काले-धन को रोकने के लिए यह प्रस्ताव लाया गया था। इस प्रस्ताव को 29 जनवरी 2018 को नियम बनाकर देश में लागू किया गया। यह एक तरीकेे का चुनाव में वित्तीय-प्रबंधन कहा जा सकता है। इस नियम के जरिये कोई भी राजनैतिक दलों को गुमनाम रूप से ‘‘चुनावी चंदा‘‘ दे सकता है। इसे आसान भाषा में ‘‘इलेक्ट्रोल-बाँड‘‘ राजनैतिक दलों को चंदा देने का एक वित्तीय-फंडिंग का जरिया है। यह एक ‘‘वचन-पत्र‘‘ की तरह होता है। जिसे भारत का कोई भी नागरिक या कंपनी देश के ‘‘भारतीय-स्टेट-बैंक‘‘ की चुनिंदा शाखाओं से खरीद सकता है, और अपने अनुसार किसी भी राजनैतिक दल को गुप्त तरीके से रकम दान कर सकता है। इस पर कोई भी ब्याज नहीं लगता है।
यह ‘‘इलेक्ट्रोल-बाँड‘‘ रूपयें 1000, रूपये 10,000, रूपयें 1,00,000, रूपयें 10,00,000 और रूपयें एक करोड़ में उपलब्ध है। इन्हे सिर्फ ‘‘भारतीय-स्टेट-बैंक‘‘ से खरिदा जा सकता है। चुनावी चंदा देने वाले को ‘‘इलेक्ट्रोल-बाँड‘‘ के बराबर की रकम एस.बी.आई के चुनिंदा शाखा में जमा करना पड़ता है। इसे कोई भी कितनी बार भी खरीद सकता है। इसकी अवधि केवल 15 दिनों की रहती है। यह ‘‘इलेक्ट्रोल-बाँड‘‘ जनवरी, अप्रेल, जूलाई और अक्टूबर के महिनों में केवल 10 दिनों की अवधि के लिए उपलब्ध कराये जाते है,और साथ ही सरकार द्वारा विश्सनीयता बनाए रखने के लिए चुनावी चंदा देने वाले का नाम गुप्त रखने का सशर्त नियमावली में हैं।
यह चुनावी चंदा उन्हीं राजनैतिक दलों को दिया जाता है, जो पिछले चुनाव में कुल मतो के 1 प्रतिशत मत प्राप्त किये हो। एसोसियसन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के रिपोर्ट अनुसार ‘‘भारतीय-स्टेट-बैंक‘‘ जनवरी 2018 से लेकर अब तक 16,518.11 करोड़ रूपयें के ‘‘इलेक्ट्रोल-बाँड‘‘ सेल किया है। जिसमें सबसे अधिक धन राशि का चनावी चंदा सत्ता पक्ष राजनैतिक दल द्वारा कुल 90 प्रतिशन से अधिक धन राशि का प्राप्त होना बताया गया है।
जहां एक तरफ सिर्फ 70.00 करोड़ रूपये अन्य राजनैतिक दल द्वारा प्रप्ता किया गये हे। दुसरी तरफ सत्तारूढ राजनैतिक दल द्वारा 610.491 करोड़ रूपयें प्राप्त किये है। सबसे चौकाने वाली जानकारी है कि -2022 -2023 के लिऐ कुल 850.438 करोड़ में से सत्ता पक्ष राजनैतिक दल को 719.858 करोड़ रूायें प्राप्त हुए है। वहीं दुसरी तरफ देश के पुराने राजनैतिक दल को मात्र 79.92 करोड़ यपये प्राप्त हुए है। इसके अलावा दिल्ली -हरियाणा की पार्टी को 37.00 करोड़ के अलावा उत्तर प्रदेश के चर्चित राजनैतिक पार्टी को मात्र 20,000 रूपयों से अधिक चुनावी चंदा प्राप्त नहीं हुए है।
चुनावी चंदा का उद्देश्य सिर्फ देश में काले-धन को रोकने के लिए ‘‘इलेक्ट्रोल – बाँड‘‘ को उचित समाधान माना गया है। यह तर्क 2017 के बजट सत्र के दौरान पूर्व वित्त मंत्री अरूण जेटली द्वारा दिया गया है। जबकी वास्तविक तथ्य धरातल में कुछ और है। उद्योगपतियों द्वारा एस.बी.आई. से खरीदे गये ‘‘इलेक्ट्रोल-बाँड‘‘ के बदले सरकार से अपनी सुविधाओं का लाभ लेने के कारण आज देश का लोकतंत्र खतरे पर है। उद्योगपतियों को असीमित भंडारण की क्षमता, उद्योगपतियों का बैंक से लिया गया 20.00 लाख करोड़ का कर्जा माफ, उद्योगपतियों द्वारा विदेश में व्यापार करने के लिए बैंको से अतिरिक्त कर्जा लिया गया हैं। इस वजह से देश की अर्थव्यवस्था दिनों-दिन रसातल में धंसती जा रहीं है। 15 फरवरी 2024 को उच्चतम न्यायालय द्वारा ‘‘इलेक्ट्रोल-बाँड‘‘ को असंवैधानिक बताकर तत्काल रोक लगाते हुए 06 मार्च 2024 तक एस.बी.आई को जनवरी 18 से लेकर आज दिनांक तक का सम्पूर्ण जानकारी उच्चतम न्यायालय में जमा करने एवं 13 मार्च 2024 तक अपने वेब-साइड में प्रसारित करने का सख्त निर्देश दिये गयें है।
किंतू आश्चर्य की बात है कि, स्वयं एसबीआई द्वारा 19 दिनों बाद 04 मार्च 2024 को उच्चतम न्यायालय में आवेदन देकर कहा गया है कि, 06 मार्च 2024 को कम समय पर सम्पूर्ण जानकारी जमा करने में असमर्थ है। अतः एसबीआई को 30 जून 2024 तक अतिरिक्त समय दिया जावें। सरकार द्वारा ‘‘डिजीटल इंडिया‘‘ का नारा दिया गया है कि, ‘‘एक क्लिक‘‘ करो, सभी जानकारी तुरंत प्राप्त करो। किंंंतु आज ‘‘एक क्लिक‘‘ का बटन काले धन के वायरस से दुषित हो जाने के कारण जानकारी अप्राप्त है। क्योंकि सरकार एवं एसबीआई दोनो एक दुसरे को बचाने के लिए 30 जून तक अतिरिक्त समय मांगा गया है। चुंकि निर्धारित समय पर जानकारी से काजल की कोठरी का काला दाग के आलावा जनता से वादाखिलाफी एवं विश्वासघात करने का कारनामे सामने आ जावेगा।
( नोट-यह लेखक के निजी विचार है।)