SC;ऐसे कैसे चलेगा मीलॉर्ड! जस्टिस यशवंत वर्मा को छोड़िये, हाईकोर्ट के 88% जजों ने तोड़ दी मर्यादा

नईदिल्ली, दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी बंगले में हाल ही में लगी आग और वहां से कथित तौर पर जली हुई नकदी मिलने की घटना ने न्यायपालिका में पारदर्शिता को लेकर बहस को फिर से हवा दे दी है. 14 मार्च को उनके सरकारी आवास के स्टोर रूम में आग लगने के बाद राहत और बचाव दल को मलबे में अधजली करेंसी नोट्स मिले थे. इस घटना ने उच्च न्यायपालिका में जजों की संपत्ति और देनदारियों की घोषणा न करने की प्रवृत्ति को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है.

खबर है कि देश की 25 हाईकोर्ट में कार्यरत 769 जजों में से महज 95 यानी केवल 12.35 फीसदी ने ही अपनी संपत्ति और देनदारियों का विवरण अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक किया है. खबर के मुताबिक, कुछ हाईकोर्ट जैसे केरल के 44 में 41 जजों ने और हिमाचल प्रदेश के 12 में से 11 जजों ने पारदर्शिता की मिसाल पेश की है, जबकि छत्तीसगढ़ और मद्रास हाईकोर्ट की स्थिति चिंताजनक है. छत्तीसगढ़ के कुल 16 जजों में से केवल 1 और मद्रास हाईकोर्ट के 65 में से 5 में स्थिति चिंताजनक है.

वहीं दिल्ली हाईकोर्ट की बात करें तो 2018 में जहां 29 जजों ने अपनी संपत्ति घोषित की थी, जबकि वर्तमान में केवल 7 जजों ने अपनी संपत्ति घोषित की है. हालांकि, यह स्थिति सभी हाईकोर्टों में एकसमान नहीं है। दिल्ली हाईकोर्ट के संग्रह में 64 पूर्व जजों की संपत्ति घोषणाएं सूचीबद्ध हैं, जिनमें से कई रिटायर हो चुके हैं, ट्रांसफर हो गए हैं, या सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत हुए हैं। इनमें से कुछ घोषणाएं फरवरी 2010 तक की हैं, जो दर्शाता है कि वर्तमान में कार्यरत जजों की तुलना में पूर्व जजों की जानकारी अधिक उपलब्ध है।

एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कुछ हाईकोर्टों ने संपत्ति घोषणा के मामले में बेहतर प्रदर्शन किया है। जिनमें केरल और हिमाचल प्रदेश प्रमुख है। केरल हाईकोर्ट के 44 में से 41 जजों (93.18%) ने अपनी संपत्ति घोषित की है। देश में यह एक बेहतरीन मिसाल है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के 12 में से 11 जजों (91.66%) ने अपनी संपत्ति का खुलासा किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने दिखाया रास्ता
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव खन्ना सहित 33 में से 30 जजों ने पहले ही अपनी संपत्ति की घोषणा कर दी है. 1 अप्रैल को हुई फुल कोर्ट मीटिंग में सभी 33 जजों ने इस जानकारी को सार्वजनिक रूप से वेबसाइट पर अपलोड करने पर सहमति जताई है.

2009 में, सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय लिया कि जजों की संपत्ति उनकी सहमति से वेबसाइट पर प्रकाशित की जा सकती है, लेकिन यह पूरी तरह स्वैच्छिक होगा। इसके बाद कुछ हाईकोर्टों ने भी इस प्रथा को अपनाया, लेकिन यह व्यापक रूप से लागू नहीं हुआ।

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