ना उम्र की सीमा हो न जन्म का है बंधन….

मैने खुद को साल, महीने,सप्ताह,दिन से परे  रखने का काम प्रारंभ किया। घर में कुछ कैलेंडर साल खत्म होने के पहले मिल जाया करते थे या लेने की उत्सुकता रहती थी, उसे दफन कर दिया।  कुछ शुभचिंतकों ने घर में आकर कैलेंडर दिया, उनके भावनाओ की कद्र किया  लेकिन घर में उन्हें, रद्दी के हवाले कर दिया।
नगद देकर आज के दिन बासी खबरों के संकलन के रूप में अखबार को देने के लिए  हॉकर को मना कर दिया।अखबार देने वाले एजेंसी का मालिक आ गया।विनम्रतापूर्वक मना करने के बावजूद वह निःशुल्क अखबार देने की पेशकश की।मैं सच बता नहीं पा रहा था, लेकिन उसे मना पाया।
मेरे लिए समय के कीमती होने  का कोई विशेष कारण नहीं  रह गया था। सो घर के अनेक कमरों में टंगे घड़ियों,कलाई में बांधने वाली  घड़ियों का मोह त्याग दिया। सभी समय सूचक यंत्रों को मेरे सहयोगी कर्मियों को दे दिया। वे खुश थे उनको समय दिखाने वाला कोई मिल गया है, मै खुश था कि दिन भर बार बार दिवालों में घड़ी घड़ी, घड़ी देखने की उत्सुकता या प्रताड़ना से मुक्त हो गया।
एक मोबाइल फोन था जो दिन, समय बताने की विवशता लिए हुए थी, उसे सस्ते में बेचकर एक ऐसा मोबाइल खरीद लाया जिसमें दिन, दिनांक और  समय न दिखने का विकल्प था। जिंदगी में ये परिवर्तन शुरुआती  दौर में बड़ा अजीब सा लगा कि साल महीने, सप्ताह, दिन, वार, घंटा, मिनट,सेकंड से बरी हो गए।
मुझे बीते दौर का मंजर भी याद आता रहा जब रात और दिन की गणना का सूचक चांद और सूरज हुआ करते थे। हर रात, चाहे वह कितनी लंबी क्यों न रही हुआ करती थी, उसका सवेरा हुआ करता रहा होगा। जिंदगी के आंकलन के लिए उम्र की गिनती नहीं थी। जी गए तो जी गए, मर गए तो मर गए।उम्र,नहीं हुआ करती थी। वो दौर कितना अच्छा था, अब उस दौर में मैं हूं।

स्तंभकार- संजय दुबे

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