FAMILY; परिवार, कुटुंब और समाज…

इस धरा में जितने भी जीव है उसमें मनुष्य को सामाजिक प्राणी माना गया है। इसने अपने मस्तिष्क का बेहतर उपयोग किया और अच्छे और बुरे के बीच भेद करना सीखा और सिखाया भी। अपने अस्तित्व की सुरक्षा के लिए कबीले को समाज में बदला। समाज में सभी को स्थापित करने के लिए कुटुंब बनाया और खुद को सुरक्षित रखने के लिए परिवार बनाया।
परिवार भी संयुक्त हुआ करते थे अर्थात एक पिता के पुरुष संतान अपने परिवार के साथ एक ही छत के नीचे रहा करते। आर्थिक रूप से इस व्यवस्था में कुछ सदस्यों के कमजोर होने पर अन्य की सदृढ़ता के चलते सब कुछ व्यवस्थित हों जाता था।
जैसे जैसे शहरीकरण का दौर आगे बढ़ा।रोजगार के चलते संयुक्त परिवार का एक छत से अनेक छत के नीचे रहने की अवधारणा भी बढ़ने लगी। संयुक्त परिवार तब भी मुख्य त्यौहारों में संयुक्त हो जाता था।
ऐसा माना जाता है कि संयुक्त परिवार की अवधारणा के टूटन का जितना बड़ा कारण आर्थिक व्यवस्था थी उसके ही बराबर परिवार की महिलाओं की आंतरिक महत्वाकांक्षा भी एक कारण थी। सामाजिक रूप से संयुक्त परिवार के भीतर तथाकथित शारीरिक शोषण भी अतिरिक्त कारण बना। जैसे जैसे ये कारण बलवती होते गए संयुक्तता टूटते गई।आज अगर संयुक्त परिवार है तो उनमें से अस्सी प्रतिशत संयुक्त होने की वजह सरकार को न दिया जाने वाला आयकर है। “अविभाजित हिंदू परिवार” कानूनी कागजों में आर्थिक कारणों से विद्यमान है।
संयुक्त परिवार के विघटन ने एकल परिवार को जन्म दिया। माना जाता है कि संपूर्ण परिवार तभी होता है जब माता पिता के संतान में कम से कम एक एक पुत्र और पुत्री हो। आधुनिक मतानुसार गणितीय रूप में ये मैक्रो परिवार है। कालांतर में अभिभावकों ने अपनी संतान को आर्थिक सुरक्षा देने के नाम पर एक ही संतान की अवधारणा को पुख्ता करने की ओर अग्रसर है। ये स्थिति सामाजिक रूप से रिश्ते के बनावट में केवल लड़के के होने और लडकी के न होने पर लड़के के संतान के चाचा और बुआ परिवार और केवल लड़की होने पर उसके संतान के मामा और मौसी परिवार की समाप्ति हो गई है। ऐसा परिवार माइक्रो परिवार के रूप में नामित हो गया है।
क्या परिवार के संकुचन का भविष्य सुखद है या दुखद है। ये बात आज प्रधान चिन्ह के रूप में है। उच्च शिक्षा का ज्वर इतना बढ़ चुका है और शायद एकल संतान का अर्थशास्त्र भी इसी कारण पुष्ट हो गया है कि संतान के दसवीं कक्षा तक जाते जाते उसके साथ अभिभावकों के महत्वाकांक्षा का बोझ भी सवार हो जाता है। भला होता है तो संतान उच्च शिक्षण संस्थाओं के नाम पर हॉस्टलर या पीजी निवासी हो जाता है। पढ़ाई पूरी हुई तो मेट्रोमैन बनकर घर में एनआरआई हो जाता है। उनके विवाह में भी जातिगत विवाह अंतिम सांस ले रही है। जातिवाद की जड़ों पर मठा डल चुका है। अब विवाह का आधार अर्हता और अर्थ हो चला है।
इन सब कारणों से सबसे नुकसान की स्थिति में एकल परिवार के अभिभावक है। आर्थिक कारणों से स्वयं में सिमटने के चलते सामाजिक समरसता की आवश्यकता होती है तब तक सामाजिक दूरी इतनी बढ़ चुकी होती है कि विवाह और मृत्यु के अलावा बच्चों के जन्मदिन के अलावा मेलमिलाप असंभव हो चला है। भौतिक संसाधनों की प्रचुरता आपको मानसिक सुख नहीं दे सकती है।सामाजिक होने का फ़ायदा ये है कि आप अपने सुख दुख दोनों को बता सुना सकते हो लेकिन इसका अभाव है तो एकाकीपन और अवसाद बढ़ रहा है।
स्तंभकार- संजयदुबे




