मध्य प्रदेश से पृथक होकर नए राज्य के रूप में जन्मे छत्तीसगढ़ राज्य को विरासत में एक सिरदर्द मिला था।ये सिरदर्द था – नक्सलवाद का। वक्त के साथ इसका ठीक ठाक इलाज नहीं हुआ जिसके चलते ये सिरदर्द ब्रेन हेमरेज में बदलने लगा। छत्तीसगढ़ सहित राज्य की सीमा से लगे उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, झारखंड में इनका प्रभाव बढ़ने लगा। आतंक का माहौल इतना बढ़ते गया कि शाम होते ही आवागमन प्रभावित होने लगा। एक ट्रैक से समानांतर सरकार सी चलने लगी थी। आतंक का प्रभाव ये भी रहा कि नक्सली अपने संख्याबल में वृद्धि करने लगे। बताया जाता है कि नक्सल प्रभावित गांवों में रह रहे परिवार से नाबालिग लड़के लड़कियों को जबरन साथ ले जाकर सदस्य बनाते, बंदूक, हैंड ग्रेनेड थमाते, सड़कों के नीचे लगे बमों से सैनिकों, पुलिस कर्मियों, नागरिकों को मरवाते और जुड़े रहने के लिए विवश कर देते।
संगठन को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए जंगल में उपजने वाले संसाधनों के एकत्रीकरण के एवज में प्रोटेक्शन मनी वसूलते। सामान्य आंकलन था कि साल में केवल छत्तीसगढ़ से साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए की उगाही की जाती थी। नक्सल दहशत के चलते प्रभावित क्षेत्रों में विकास की गति रुक सी गई थी। शिक्षा, स्वास्थ्य, और सुरक्षा के लिए केवल खानापूर्ति होते रही।
केंद्र और राज्य में बहुमत की सरकारे सामंजस्य के अभाव में नक्सलवाद के बढ़ावे को रोक नहीं पाए। इसका अनेक दुखद परिणाम भी देखने को मिला। झीरम में कांग्रेस के स्थापित जनप्रतिनिधियों का जिस प्रकार से नर संहार किया गया वह किसी देश की भीतरी संप्रभुता को चुनौती थी। अर्ध सैनिक बलों सहित पुलिस के बड़े अधिकारी सहित जवान नक्सलवाद के शिकार बने। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पांच सरकारों के गृह मंत्री के रूप में लाल कृष्ण आडवाणी, शिवराज पाटिल, पी चिदंबरम चिदंबरम ,सुशील कुमार शिंदे, राजनाथ सिंह आए और अपना कार्यकाल पूरा कर चले गए लेकिन नक्सलवाद को खत्म करने की बात दूर कमजोर भी नहीं कर पाए।
भारत में एक पार्टी की बहुमत वाली सरकार की स्थापना भी नक्सलवाद के जड़ को हिला नहीं पाई। ये जरूर रहा कि अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद कार्य योजना बनी और पिछले दो साल में अपेक्षित परिणाम भी देखने को मिला। नक्सल प्रभावित राज्यों की सरकारों और सीआरपीएफ के अधिकारियों के सामंज्यस के चलते दो साल में नक्सलवाद की न केवल कमर टूट गई बल्कि वे इतने बेबस हो गए कि उनके पास आत्म समर्पण या मौत में से एक को चुनना शेष बच गया। जिन नक्सलियों को हार्डकोर नक्सलियों का दर्जा प्राप्त था, सैकड़ों निर्दोष नागरिक, जवानों को मारे जाने के चलते लाखों करोड़ों के इनामी थे, एक के बाद एक या तो मारे गए या समर्पित हो गए।
31 मार्च 2026 को देश से नक्सलवाद को मटियामेट करने की सिंह गर्जना पूर्ण होते दिख रही है क्योंकि नक्सलवाद खात्मे के कगार पर है।गिने चुने कमांडर बचे है वे भी अगले एक महीने में या तो मारे जाएंगे या समर्पण का रास्ता अपनाएंगे ऐसी उम्मीद है। ग्रामीण अंचल से तो नक्सलवाद खात्मे की ओर है लेकिन अर्बन नक्सलवाद अभी भी अपने नेटवर्क फैलाए हुए है।इनका भी इलाज करना जरूरी है।अमित शाह बधाई के पात्र है जिन्होंने अपने को सरदार वल्लभ भाई पटेल साबित करके दृढ़ गृह मंत्री होने का प्रमाण दिखा दिया है।
स्तंभकार-संजय दुबे





