रायपुर, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, रायपुर के चिकित्सकों ने एक दुर्लभ और जानलेवा ट्रॉमेटिक डायफ्रामेटिक रप्चर से पीड़ित युवा मरीज का सफलतापूर्वक उपचार कर उसकी जान बचाई है। यह मामला ब्लंट ट्रॉमा के बाद गंभीर आंतरिक चोट का एक असामान्य उदाहरण माना जा रहा है, जिसमें बाहरी लक्षण बेहद कम थे।
जानकारी के अनुसार, 22 फरवरी 2026 की रात महासमुंद जिले में एक निर्माणाधीन भवन की पहली मंजिल से लगभग 8 फीट की ऊंचाई से गिरने के बाद मरीज को शुरुआत में कोई गंभीर बाहरी चोट नहीं दिखी और वह बेहोश भी नहीं हुआ। अगले दिन 23 फरवरी को सीने में दर्द और हल्की सांस फूलने की शिकायत पर उसने शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय, महासमुंद में उपचार लिया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उसे छुट्टी दे दी गई।

हालांकि लक्षणों में वृद्धि होने पर 24 फरवरी को एक निजी अस्पताल में कराए गए सीटी स्कैन में गंभीर आंतरिक चोट का पता चला, जिसके बाद मरीज को उन्नत उपचार के लिए एम्स रायपुर रेफर किया गया। यहां विस्तृत जांच में बाईं ओर डायफ्राम में लगभग 7×8 सेंटीमीटर का बड़ा रप्चर पाया गया, जिसके कारण आमाशय, यकृत का बायां भाग तथा बड़ी आंत जैसे पेट के अंग छाती के बाएं हिस्से में खिसक गए थे, जिससे लेफ्ट हेमोथोरैक्स की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। इसके अतिरिक्त, मरीज में कई पसलियों, थोरैसिक रीढ़ तथा हाथ-पैरों में भी फ्रैक्चर पाए गए।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मरीज की आपातकालीन सर्जरी की गई। जनरल सर्जरी विभाग की टीम, जिसका नेतृत्व डॉ. राधाकृष्ण रामचंदानी ने किया, उन्होंने थोरैको-एब्डॉमिनल चीरे के माध्यम से ऑपरेशन कर सभी विस्थापित अंगों को पुनः पेट में स्थापित किया, रक्तस्राव को नियंत्रित किया और डायफ्राम की मरम्मत मेष तकनीक से की। ऑपरेशन के बाद इंटरकॉस्टल ड्रेनेज ट्यूब डाली गई। सर्जरी के पश्चात मरीज को गहन चिकित्सा इकाई में विशेषज्ञ निगरानी में रखा गया, जहां समुचित पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल के बाद उसकी स्थिति में लगातार सुधार हुआ। लगभग 15 दिनों के उपचार के बाद मरीज को स्वस्थ अवस्था में छुट्टी दे दी गई।
एम्स रायपुर के चिकित्सकों के अनुसार, डायफ्राम का ट्रॉमेटिक रप्चर एक दुर्लभ लेकिन संभावित रूप से घातक स्थिति है, जिसमें पेट के अंग छाती में पहुंच जाते हैं। समय पर पहचान, उचित रेफरल और त्वरित सर्जिकल हस्तक्षेप इस मामले में जीवनरक्षक साबित हुआ।







