
जिंदगी के पहले साल जिसे आप नासमझी की उम्र कह सकते है उस दौर में रावण के मरने मारने की बातों का मुझसे कोई सरोकार नहीं था। घर में भी और शिक्षा के केंद्र याने विद्यालय में भी रावण ऐसा कोई व्यक्तित्व नहीं था, जिसके बारे में जानकारी मिली हो। तब रेडियो में भी ऐसा कोई वाक्या सुना हो याद नहीं। उम्र किशोरावस्था को छूने लगी थी याने,चौदह साल होने को थी उस उम्र में बड़े चाचा के पूजा घर में रामायण को उलटने पलटने पर एक चित्र जरूर दिखा था।आकाश मार्ग से किसी स्त्री को लेकर जाते हुए…..।
चाचा से पूछने पर कथा सार के रूप में राम, सीता, लक्ष्मण ,हनुमान, रावण के बारे में तब जानकारी उस उम्र में मिली जितने अवधि में भगवान राम, रावण को मार वनवास खत्म कर अयोध्या की राज गद्दी सम्हाल चुके थे।
रामायण के चित्रमय रावण के बाद पात्र रावण से आत्मसात राम लीला के जरिए हो ही गई। छिंदवाड़ा स्थित छोटा बाजार में राम मंदिर हुआ करता था, अब भी है।इसी जगह पर राम लीला का मंचन हुआ करता था। जहां तक मुझे याद है गेंदलाल साहू, जो किराना दुकान के मालिक थे, रावण की भूमिका निभाया करते थे। वे ही पहले जीवंत रावण थे, मेरे रामलीला के आखरी दिन बामुश्किल 15 -20 फीट ऊंचा रावण का पुतला राम मंदिर से निकल कर एक मैदान के लिए चार बजे निकलता और एक किलोमीटर की यात्रा पूर्ण कर दहन हो गया। रावण का यह पुतला लगभग मारियो गेम के पात्र के समान शायद दिखता था।
इसी दौर में होमी वाडिया की फिल्म “संपूर्ण रामायण” देखने को मिली।ये फिल्म बनी तो 1961 में थी लेकिन 1975 में देख पाए। बी एम व्यास याने बृजमोहन व्यास रावण की भूमिका निभाए थे। चित्र, मंच के बाद पर्दे पर रावण देखने का तीसरा अवसर था।
थोड़ी थोड़ी समझ में दुनियादारी आने लगी तो मैसूर और दिल्ली का दशहरे की जानकारी समाचार पत्रों के माध्यम से मिलने लगी।
1987 में रामानंद सागर टेलीविजन में रामायण धारावाहिक लेकर आए ।अरविंद त्रिवेदी ,रावण की भूमिका को जीवंत कर गए।
एक रावण जो चित्र में दिखा, मंच पर दिखा, बड़े पर्दे पर दिखा, छोटे पर्दे पर दिखा सबका व्यक्तित्व अलग अलग था। सबमे एक बात कामन थी सभी ने वही काम किया जो रावण ने यथार्थ में किया रहा होगा। हिंदू धर्म में स्थापित खलनायक जिसे मारने के लिए राम को चौदह साल का वनवास भोगना पड़ा, पत्नी के अपहरण की त्रासदी झेलनी पड़ी।
अब जबकि उम्र अपने उत्तरार्ध की ओर अग्रसर है तब बीते से अब तक के रावणों को देखता हूं। शहर में इक्का दुक्का स्थानों की जगह सैकड़ों। जगहों पर रावण का दहन हो रहा है। आकार में प्रतिस्पर्धा है। दिल्ली के द्वारका में 221 फीट ऊंचा रावण बनाया गया है। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड भी होगा। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में 101 फीट ऊंचा रावण रेलवे कालोनी में जलता है। रावण की ऊंचाई को बढ़ने लेकर समाज में बुराई को बढ़ने से ले सकते है। ऐसा नहीं है कि रावण का कद विशाल ही हो, बाजारवाद का जोर है ।बौना रावण भी बाजार में मिल रहा है।एक फुट का रावण सौ रुपए में।अगर भीड़ में नहीं जाना है तो घरेलू रावण है।पांच मिनट में जल जाएगा। कागजी रावण के अलावा छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रावणभाठा नाम का एक स्थान है जहां का रावण स्थाई है दशहरा के दिन इस रावण को डंडे से मार कर लोग अपने अपने रावण वध की प्रक्रिया पूरी करते है।
थोड़ा सा इतिहास भी खंगाल लेते है।हिंदुस्तान में राज परिवारों के बारे में जो जानकारी है उसका सार यही है कि अधिकांश राज्यों के राजा क्षत्रिय हुआ करते थे। बामुश्किल सात आठ वंश ही थे जैसे शुंग, काण्डव,पेशवा, भूमिहार इन लोगों ने कुछ सौ साल पहले ही राज किया था।
क्षत्रियों के बीचमहर्षि विश्रवा का पुत्र रावण ब्राह्मण राजा था। आदिकाल में जितने भी राजा थे उनके वैभव के मामले में रावण का राज्य वैभवशाली था।ज्ञान के मामले में, भक्ति को लेकर, धर्म को लेकर रावण अद्वितीय था। उनके जैसे पुरोहित बहुत कम हुए है। शिव तांडव स्त्रोत के 15 श्लोक रावण के द्वारा लिखित है
“जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥”
पहला श्लोक ही बताता है कि रावण का ज्ञान कितना गहन था।
केवल पुतले को जला देने से ज्ञानी रावण के सृजन का अंतिम संस्कार नहीं हो सकता है ।
स्तंभकार-संजय दुबे







