LPG; गैस सिलेंडर की कमी किन्हें है?

ईरान और इजरायल युद्ध के चलते  हिंदुस्तान में रसोई के लिए उपयोग किए जाने वाले गैस सिलेंडर के लिए  आम नागरिकों में चिंता और रसोई को निर्बाध रखने के लिए  सुरक्षित व्यवस्था  प्रश्न चिन्ह बन गया है। गैस एजेंसियों के सामने भीड़ बढ़ गई है। स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में आक्रोश भी पनपता है और राजनीति भी होती है।
सभी जानते है कि गैस कंपनियों ने नियम बनाया हुआ है कि एक घरेलू गैस सिलेंडर मिलने के बाद दूसरा सिलेंडर इक्कीस दिन ( वर्तमान में 25 दिन कर दिया गया है) के बाद ही मिलेगा।
नब्बे फीसदी घरेलू गैस उपभोक्ताओं के यहां डीबीसी याने दो दो सिलेंडर  अधिकृत रूप से है। इसकी उपलब्धता के आधार पर देखे तो 42 दिन के लिए घर में रसोई गैस सुरक्षित है।  कठिन समय है तो घर की महिलाएं मितव्ययिता के साथ सात आठ दिन का गैस  बचा सकती है।  वर्तमान में  गैस  एजेंसियों के यहां जो भीड़ दिख रही है उनमें से अधिकांश उपभोक्ता ऐसे है जिनके पास एक ही गैस सिलेंडर है और वह खत्म हो गया है। दूसरे उपभोक्ता वे है जिन्होंने “घर पहुंच सेवा याने होम डिलीवरी नहीं लिया। इनके अलावा एक वर्ग जिसे आतुर उपभोक्ता( पैनिक कंज्यूमर ) कहा जाता है वे है। इनके पास दो दो घरेलू गैस सिलेंडर है। एक का उपयोग शुरू हुआ है याने तीन सप्ताह सब्र किया जा सकता है। ऐसे लोग सीधे खाली सिलेंडर लेकर एजेंसी के ऑफिस या गोदाम  पहुंच जाते है।  गैस कंपनियों ने उपभोक्ताओं के लिए  मैसेज के द्वारा बुकिंग सुविधा पहले से दे रखी है। इसका पालन किए बगैर  एजेंसी जाने पर समस्या का विधिक हल नहीं होगा लेकिन खबरें जरूर बन जाएगी, राजनीति हो जाएगी कि गैस की किल्लत हो गई है। ।
स्वाभाविक है कि आपूर्ति  प्रभावित हुई है लेकिन ऐसा भी नहीं है घर के  गैस चूल्हे बंद हो जाए, खाना बनना भी बंद हो जाए।
जब कोई संकट देश पर आए तो आक्रोश और अनियंत्रित व्यवहार के स्थान पर संयम का परिचय देना ज्यादा बेहतर होता है। हो सकता है कि बीते समय मे एक से लेकर तीन दिन की अवधि में गैस सिलेंडर मिल जाता था। संकट है तो  इए सात से दस दिन में मिल जाएगा। इतना गैस कंपनी के पास अभी व्यवस्था है। इससे अगले दो महीने तक घर के रसोई पर संकट नहीं आने वाला है। देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी को याद करे जिन्होंने युद्ध में अनाज संकट के हल के लिए एक समय का भोजन त्याग कर उपवास रहने की बात कही थी।देशवासियों ने इसका पालन भी किया था। अनाज का तो तब के दौर में विकल्प नहीं था लेकिन खाना बनाने के लिए ईंधन के रूप में इलेक्ट्रिक चूल्हा, इंडक्शन  की शहरी क्षेत्र में व्यवस्था है।ग्रामीण क्षेत्रों में जरूर इलेक्ट्रॉनिक चूल्हों या इंडक्शन  के उपयोग के लिए उपभोक्ता आदी नहीं है।इस कारण विकल्प के रूप में केरोसिन की व्यवस्था  करना सरकार की जिम्मेदारी होगी।
अब बात आती है होटलों की जहां देश की बड़ी आबादी नाश्ता खाना के लिए निर्भर होते है।इसके अलावा  अध्ययनरत छात्रों के हॉस्टल भी बहुत बड़ा सेक्टर है जहां कमर्शियल गैस सिलेंडर का उपयोग होता है। केंद्र और राज्य की सरकारों ने   इनको विशेष सुविधा देने की बात कही है।जिसका कड़ाई से पालन हो।
होटल वालों के पास  कमर्शियल गैस सिलेंडर का विकल्प डीजल से चलने वाले भट्टी है।डीजल की कमी नहीं है इसलिए होटल संचालकों को ज्यादा परेशानी नहीं होगी। परेशानी छोटे छोटे चाय नाश्ता बनाने वाले गुमटियों या कियोस्क को जरूर होगा क्योंकि छोटे सी जगह में  गैस चूल्हे की जगह कोई अन्य विकल्प दुर्घटना की संभावना को बढ़ा सकता है। इसलिए सरकार सहित  गैस कंपनियों को होटल व्यवसायियों के हित को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए क्योंकि होटल उद्योग से करोड़ों लोगों को रोजगार मिलता है और भूखे व्यक्ति को नाश्ता और खाना भी मिलता है।

स्तंभकार-संजयदुबे

  • Narayan Bhoi

    Narayan Bhoi is a veteran journalist with over 40 years of experience in print media. He has worked as a sub-editor in national print media and has also worked with the majority of news publishers in the state of Chhattisgarh. He is known for his unbiased reporting and integrity.

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