
नईदिल्ली, भाजपा के वरिष्ठ नेता सांसद धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। श्री प्रधान का इस्तीफा दुनिया की भर मीडिया में सुर्खियां बनी। वैश्विक मीडिया ने भारत के जेन जी आंदोलन को लेकर कई रिपोर्टें की। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर द इकोनॉमिस्ट ने लिखा, ये भारतीय राजनीति के लिए दुर्लभ क्षण रहा। जेन जी ने मोदी सरकार को झुका दिया। उन्होंने अपने लेख में बताया कि हो सकता है कि भारत की ‘जेन Z’ पीढ़ी को वह शिक्षा न मिल रही हो जिसकी वह हकदार है। जेन जी ने मोदी सरकार को सबक सिखाया है।
भारत की पारंपरिक मीडिया के खिलाफ अविश्वास
ब्रिटेन की एक अखबार ने लिखा कि सोशल मीडिया को लेकर जेन जी की जानकारी और उसके इस्तेमाल ने भारत के पारंपरिक मीडिया के प्रति अविश्वास को बढ़ाया है। उन्होंने यह बता दिया कि सरकारी प्रोपेगैंडा की भी एक सीमा होती है। द न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा कि विरोध प्रदर्शन, पुलिस की बर्बरता और आंसू गैस के गोलों ने भी जेन जी पर कामयाबी नहीं पाई। भारत के युवा डटे रहे। उन्होंने अपनी ताकत से भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चौंका दिया।
पहली बार सीधे तौर पर PM मोदी के खिलाफ नारेबाजी
फाइनेंशियल टाइम्स ने अपने आर्टिकल में लिखा कि 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों पर की गई कार्रवाई के बाद पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सड़क पर नारेबाजी हुई। सरकार प्रदर्शनकारियों के एंटी नेशनल करार देने की कोशिश में भी नाकाम रही। FT ने लिखा कि इसकी मुख्य वजह यह थी कि सड़क से लग रहे नारे में शामिल लोग ज्यादातर बीजेपी के वोटर बेस से थे। छात्र और युवा हर दिन उस सरकार से जवाबदेही की मांग करने के लिए सामने आए जिसे लोगों ने वोट दिया था।
बड़े वर्ग ने सीधे की मोदी की आलोचना
FT ने लिखा कि जहां तक मुझे याद है, यह पहली बार है जब भारतीयों के एक बड़े वर्ग ने प्रधानमंत्री की नाम लेकर आलोचना की है। विरोध करने वाले कई छात्र BJP के मुख्य वोटर बेस, हिंदू, मध्यम-वर्गीय परिवारों से आते हैं। जिनमें से कुछ को उनके माता-पिता ने विरोध करने के लिए प्रोत्साहित किया, तो कुछ अपने परिवारों की बात न मानकर वहां पहुंचे।
अलजजीरा ने लिखा कि मोदी सरकार की सोशल मीडिया रणनीतियां भी विफल रहीं, क्योंकि जेन जी ने बाजी पलट दी। अलजजीरा ने लिखा कि Gen Z सोशल प्लेटफॉर्म पर अपनी हिंदू-बहुसंख्यकवादी पार्टी के दबदबे को पलट रहा है और उन्हीं हथियारों का इस्तेमाल उसके खिलाफ कर रहा है जिन पर भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से निर्भर रही है। साथ ही, प्रदर्शनकारियों का हवाला देते हुए कहा गया कि पहली बार, असहमति को अपराध मानने के सालों बाद मोदी से नफरत करना कूल हो गया है।
NEET पेपर लीक ही नहीं धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का ये भी है कारण! कार्यकाल के दौरान गरमाया था मुद्दा
केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद उनके कार्यकाल की चर्चा शुरू हो गई है। करीब साढ़े 5 साल तक शिक्षा मंत्रालय संभालने वाले प्रधान के सामने कई बड़ी चुनौतियां रहीं। इनमें NEET-UG पेपर लीक, NTA की कार्यप्रणाली, UGC के नियम, NCERT की किताबों में बदलाव और राज्यों के साथ टकराव जैसे मुद्दे शामिल रहे। शिक्षा नीति से लेकर विश्वविद्यालयों की नियुक्तियों तक कई फैसलों पर सवाल उठे। हालांकि सीजेपी के विरोध प्रदर्शन…NEET परीक्षा विवाद सबसे बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया।
NEET और NTA विवाद ने बढ़ाया दबाव
धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में सबसे बड़ा संकट प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर रहा। NEET-UG पेपर लीक मामले ने देशभर में स्टूडेंट्स और पैरेंट्स की चिंता बढ़ा दी। 2024 में NEET परीक्षा में पेपर लीक और ग्रेस मार्क्स को लेकर विवाद हुआ। कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और जांच एजेंसियों को भी कार्रवाई करनी पड़ी। इसके बाद 2026 में NEET परीक्षा को लेकर फिर विवाद सामने आया। पेपर लीक की आशंका के बाद परीक्षा रद्द करनी पड़ी और दोबारा परीक्षा आयोजित की गई। इस घटना ने छात्रों के भरोसे और परीक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा किया।
UGC-NET परीक्षा भी विवादों में
इसके अलावा UGC-NET परीक्षा भी विवादों में आई। परीक्षा के एक दिन बाद ही इसे रद्द कर दिया गया। मंत्रालय ने पेपर लीक की जानकारी मिलने के बाद जांच के आदेश दिए। लगातार हो रही गड़बड़ियों के कारण नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) पर भी सवाल उठे। NEET, JEE, CUET और दूसरी बड़ी परीक्षाओं की जिम्मेदारी संभालने वाली NTA को तकनीकी खामियों और प्रबंधन की समस्याओं को लेकर आलोचना झेलनी पड़ी।
NCERT बदलाव और भाषा नीति पर विवाद
धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में शिक्षा के पाठ्यक्रम को लेकर भी कई बहस हुईं। NCERT की किताबों के रेशनलाइजेशन को लेकर काफी विवाद हुआ। सरकार ने इसे छात्रों पर पढ़ाई का बोझ कम करने की कोशिश बताया। लेकिन विपक्ष और कई इतिहासकारों ने आरोप लगाया कि पाठ्यक्रम में बदलाव के जरिए इतिहास के कुछ हिस्सों को हटाया जा रहा है। कक्षा 12 की इतिहास और राजनीति विज्ञान की किताबों से मुगल इतिहास, गुजरात दंगों और लोकतांत्रिक आंदोलनों से जुड़े कुछ हिस्सों को हटाने पर सवाल उठे।
विश्वविद्यालयों और शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी कई फैसले चर्चा में रहे। 2025 में UGC के नए ड्राफ्ट नियमों में वाइस चांसलर नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव का प्रस्ताव आया। इन नियमों में वीसी पद के लिए पात्रता बढ़ाने और नियुक्ति प्रक्रिया में राज्यपाल व विजिटर की भूमिका बढ़ाने की बात कही गई थी। कई विपक्षी राज्यों और शिक्षाविदों ने इसका विरोध किया। ‘PM SHRI’ स्कूल योजना को लेकर भी केंद्र और राज्यों के बीच मतभेद सामने आए। कुछ राज्यों ने योजना से जुड़ी शर्तों को लेकर आपत्ति जताई।






