SC; अस्पताल भी ‘धंधा’ है? 48 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था, अब ‘पोस्टमॉर्टम’ करने सीजेआई संग बैठेंगे 8 जज

नई दिल्ली, भारतीय न्यायपालिका के गलियारों में एक ऐसी कानूनी जंग छिड़ने वाली है जिसकी गूंज देश की हर फैक्टरी, अस्पताल और सरकारी दफ्तर तक सुनाई देगी. भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के नेतृत्व में गठित 9 जजों की संविधान पीठ आने वाली 17 मार्च से उस ऐतिहासिक पहेली को सुलझाने जा रही है जो पिछले 48 सालों से उलझी हुई है. क्या एक चैरिटेबल ट्रस्ट ‘उद्योग’ है? क्या सरकारी योजनाएं भी इंडस्ट्री के दायरे में आती हैं? इन सवालों का जवाब तय करेगा कि आने वाले समय में देश के करोड़ों कामगारों के अधिकार क्या होंगे. यह पूरा विवाद 1978 के ‘बेंगलुरु वाटर सप्लाई’ मामले से जुड़ा है, जहां जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर की बेंच ने ‘उद्योग’ की इतनी व्यापक परिभाषा दी थी कि लगभग हर संस्थान इसके दायरे में आ गया. अब 9 जजों की यह ‘सुपर बेंच’ दो दिनों (17 और 18 मार्च) के भीतर यह तय करेगी कि क्या आधी सदी पुराने उस कानून को बदलने का वक्त आ गया है.

क्या है बेंगलुरु वाटर सप्लाई मामला?
1978 के इस फैसले ने लेबर लॉ के परिदृश्य को बदल दिया था. कोर्ट ने ट्रिपल टेस्‍ट दिया था जिसके अनुसार किसी भी गतिविधि को उद्योग माना जाएगा यदि:

1.      वहां मालिक और कर्मचारी के बीच व्यवस्थित सहयोग हो.

2.      वह वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन/डिस्‍ट्रीब्‍यूशन के लिए हो.

3.      वह मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हो.

कोर्ट ने कहा था कि संस्थान का लाभ कमाना जरूरी नहीं है. इसके कारण धार्मिक ट्रस्ट, अस्पताल और क्लब भी ‘उद्योग’ के दायरे में आ गए थे.

संविधान पीठ के सामने 3 प्रमुख कानूनी सवाल
9 जजों की यह पीठ मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार करेगी:

1.      कानूनी प्रभाव: क्या 1978 का फैसला सही कानून था? साथ ही, Industrial Relations Code, 2020 (जो 21 नवंबर 2025 से प्रभावी हुआ) का ‘उद्योग’ की परिभाषा पर क्या कानूनी प्रभाव पड़ेगा?

2.      सरकारी योजनाएं: क्या सरकार द्वारा संचालित सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं और विभागों को ‘औद्योगिक गतिविधि’ माना जा सकता है?

3.      देश सेवा से जुड़े कार्य: राज्य के कौन से कार्य ‘संप्रभु’ माने जाएंगे और क्या ऐसे कार्य औद्योगिक विवाद अधिनियम (ID Act) के दायरे से बाहर होंगे?

इस सुनवाई का महत्व और प्रभाव
·श्रम बनाम प्रबंधन: यदि ‘उद्योग’ की परिभाषा को संकुचित (Narrow) किया जाता है तो कई सरकारी विभागों और ट्रस्टों के कर्मचारियों से लेबर होने का दर्जा छिन सकता है जिससे उनके कानूनी संरक्षण पर असर पड़ेगा. सरकारी विभागों को राहत: कई वर्षों से सरकार का तर्क रहा है कि संप्रभु कार्य (जैसे पुलिस, न्यायपालिका, टेक्‍सेशन) को उद्योग नहीं माना जाना चाहिए. इस फैसले से राज्य की जवाबदेही स्पष्ट होगी.

·कानूनी स्पष्टता: 2002 से लंबित यह मामला अब अंततः स्पष्टता की ओर बढ़ रहा है. 2020 के नए लेबर कोड के लागू होने के बाद इस संवैधानिक व्याख्या की अहमियत और बढ़ गई है.

मुख्य प्‍वाइट्स
·बेंच की संरचना: सीजे आई सूर्यकांत के नेतृत्व वाली इस पीठ में जस्टिस बीवी नागरत्ना, पीएस नरसिम्हा, दीपांकर दत्ता, उज्ज्वल भुइयां, सतीश चंद्र शर्मा, जॉयमाल्या बागची, आलोक अराधे और विपुल एम. पंचोली शामिल हैं.

सुनवाई का समय: यह पीठ 17 मार्च से सुनवाई शुरू करेगी और 18 मार्च तक इसे समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया है.

 ऐतिहासिक संदर्भ: 1978 में जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर की अध्यक्षता वाली 7 जजों की बेंच ने ‘उद्योग’ शब्द की बहुत विस्तृत व्याख्या की थी. अब 9 जजों की बेंच यह तय करेगी कि क्या वह व्याख्या आज के समय में सही है.

  • Narayan Bhoi

    Narayan Bhoi is a veteran journalist with over 40 years of experience in print media. He has worked as a sub-editor in national print media and has also worked with the majority of news publishers in the state of Chhattisgarh. He is known for his unbiased reporting and integrity.

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