COLUMN; क्या सरकारी कर्मचारी का कोर्ट जाना अनुशासनहीनता है?

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने   छत्तीसगढ़ शासन द्वारा डेप्युटी इंस्पेक्टर जनरल पद पर अरविंद शांडिल्य द्वारा अपनी वरिष्ठता को आधार बनाते हुए डी जी जेल न बनाए जाने पर चुनौती दी थी। उच्च न्यायालय ने  प्रवीण्यता वरिष्ठता (merit cum seniority) के आधार पर अमित शांडिल्य के द्वारा प्रस्तुत  प्रमाण के आधार पर माना कि उनके साथ न्याय नहीं हुआ है। उच्च न्यायालय ने न्याय भी कर दिया सिर्फ चार महीने में।
व्यवस्थापिका और कार्यपालिका में सांठ गांठ होने पर अपने अपने पसंदीदा अधिकारियों को उच्च पद पर बैठाने का काम नया नहीं है। ये वर्षों से होते आ रहा है और वर्षों तक होते रहेगा। डरपोक अधिकारी शासन के आदेश को मन मार कर सह लेते है क्योंकि उन्हें लगता है कि उच्च अधिकारियों से कौन पंगा ले। खुद भी गलत जगह होते है इस कारण  वरिष्ठता और प्रवीण्यता
नजर अंदाज होते रहती है। खाद्य विभाग में इस बात का जीता जागता उदाहरण रहा है जहां एक जूनियर अधिकारी ने दो दो आदिवासी अधिकारियों को सुपारसीड  कर  अपने प्रमोशन के लिए उनसे प्रमोशन न लेने का दबाव बना कर आदिवासी अधिकारियों  से ऊपर हो गया। इस बार जेल विभाग में ऐसा हुआ जब वरिष्ठ डी आई जी अरविंद शांडिल्य  की वरिष्ठता और प्रावीण्यता को अनदेखा कर उनसे जूनियर अधिकारी को उनके ऊपर बैठा दिया गया।
पुलिस विभाग के अरविंद शांडिल्य ने अपने साथ हुए अन्याय के लिए उच्च न्यायालय  छत्तीसगढ़ के शरण में गए। उच्च न्यायालय ने भी माना कि अरविंद शांडिल्य डीजी जेल बनने की सारी योग्यता और वरिष्ठता रखते है। इस आधार एस एस तिग्गा के प्रमोशन को रद्द कर दिया।
ये तो हो गई न्यायपालिका के न्याय की, अब बात बात आती है कार्यपालिका की। कार्यपालिका के द्वारा जारी आदेश को पलटना उच्च अधिकारियों के अहंकार  को एक प्रकार से चुनौती होती है। न्यायपालिका जब भी शासकीय अधिकारियों के पक्ष और कार्यपालिका के विपक्ष में निर्णय देता है इससे केवल कार्यपालिका ही नहीं बल्कि व्यवस्थापिका को भी दुख होता है, नाराजगी देखी जाती है।  दरअसल  व्यवस्थापिका और कार्यपालिका की गलबहियां के चलते अमूमन हर शासकीय विभागों में अपने पसंदीदा अधिकारियों को  उच्च पद पर बैठाने का खेल चल रहा है। मंत्रियों की अपनी पसंदगी होती है, उच्च पद पर बैठे अधिकारियों की अपनी पसंद होती है। आज का दौर ऐसा है कि खुशामदी अधिकारी नजरों पर चढ़े होते है।सरकारी काम करे न करे लेकिन निजी कामों में माहिर होते है। ऐसे अधिकारी बकायदा मंत्री , उच्च अधिकारियों  के घर में बैठे काम करते देखे जा सकते है। इनको इन बातों का पुरस्कार भी मिलता है। मनचाहे जगह पर नौकरी करते है, मनचाहे प्रमोशन पाते है।  मनचाहे ढंग से योग्य अधिकारियों की प्रवीण्यता और वरिष्ठता को अनदेखा करवाते है
हर विभाग  में प्रमोशन के नियम बने हुए है। प्रतियोगी परीक्षा में प्रावीण्यता , वरिष्ठता का आधार बनती है और हर साल  दायित्व का निर्वाह किए जाने पर वर्गीकृत क+, क,ख, घ श्रेणी   दिया जाता है। प्रमोशन के लिए विभागीय  समिति बीते पांच साल की रिपोर्ट देखती है। आमतौर पर क+ अद्वितीय कार्य के लिए दिया जाता है इसे उत्कृष्ट श्रेणी माना जाता है। क याने अच्छा, ख याने औसत और घ श्रेणी का अर्थ  खराब होता है। इनसे प्रमोशन पर तभी फर्क पड़ता है जब घ श्रेणी लगातार मिल जाए।
अरविंद शांडिल्य की वार्षिक  रिपोर्ट शानदार है, ऐसे में उनको डी जी जेल प्रमोट करने पर नियमानुसार  कोई  दिक्कत नहीं थी। “दिक्कत” क्या थी इसका जवाब उच्च अधिकारियों को देखना है।
अरविंद शांडिल्य जैसे निर्भीक और न्याय के लिए तत्पर अधिकारियों की संख्या  उंगलियों में गिनने लायक है जो अपने उच्च अधिकारियों के गलत निर्णय का विरोध कर न्यायालय का शरण लेने का साहस करते है। ऐसे अधिकारी व्यवस्थापिका और कार्यपालिका के लिए शाबाशी के लायक नहीं होते। इनके लिए  व्यवस्थापिका और कार्यपालिका अवसर के तलाश में रहती है। बीते कार्यकाल में गलती खंगाली जाती है। शायद ही ऐसा कोई अधिकारी होता है जिससे चूक न हुई हो।यही चूक को अवसर में बदलने का काम होता है। जब प्रथम श्रेणी का अधिकारी ही न्याय पाने के लिए उच्च न्यायालय जा रहा है तो द्वितीय और तृतीय श्रेणी के अधिकारियों के साथ कैसा हो रहा होगा? इसका आंकलन उच्च न्यायालय के सेवा निवृत न्यायधीश की कमेटी में होना चाहिए।

स्तंभकार-संजयदुबे

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