एक दौर हुआ करता था जब फिल्मों के साथ रजत स्वर्ण और हीरक जयंती जैसे शब्द जुड़ा करते थे। पच्चीस सप्ताह चली तो रजत, पचास तो स्वर्ण और साठ सप्ताह फिल्म लगातार चल गई तो हीरक जयंती मनाया जाता था। मल्टी प्लेक्स के आने के बाद फिल्मों के जयंती वाली परंपरा खत्म हो गई। नए रूप में विवाह के वर्षगांठ में पच्चीस साल पूरे होने पर रियूनियन और पुरानी फिल्मों का बहुत सीमित जगहों में पुनः प्रदर्शन होता है।
2026 के 15 जून को आशुतोष गावरीकर की अदभुद और एतिहासिक फिल्म “लगान” को थियेटर पर आए पच्चीस साल पूरे हो गए है। आज चर्चा में फिर से फिल्म। इस फिल्म में क्रिकेट के भीष्म पितामह कहे जाने वाले देश इंग्लैंड के अधिकारियों के द्वारा भारत के एक गांव में लगान वसूली से छुटकारा पाने के लिए क्रिकेट मैच खेलने और जीतने का अनिवार्य शर्त रखी जाती है, हारने पर तीन गुना लगान देने की भी अनिवार्य शर्त होती है।
गांव का एक युवक भुवन जोखिम मोल लेता है। क्रिकेट की टीम बनती है, खेल के सामान बनाए जाते है।पीछे से इंग्लैंड की एक युवती तकनीकी तरीके बताती है। क्रिकेट के साथ प्रेम त्रिकोण भी चलता है( प्रेम के बिना जीवन अधूरा है)
दो पारी का मैच होता है। उतार चढ़ाव के साथ मैच चलता है।आखिरी बाल में जीत के लिए चार रन की जरूरत होती है। फ्लैश बैक में तीन गुना लगान और चुनौती के समर्थन में बाते दिखती है।अंततः बाल कैच होती है लेकिन फिल्डर बाउंड्री के बाहर हो जाता है।( शारजाह में चेतन शर्मा की बाल पर जावेद मियादाद का छक्का याद होगा)। सुखद अंत होता है।
भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में बहुतायत रूप से मसाला फिल्मे बनने की दौर में आशुतोष गावरीकर ने नए प्रकार का कथानक विन्यास बनाया था।आमिर खान ने पहली बार में “गली क्रिकेट” मानकर मना बोल दिया था।बाद में माने तो उनके साथ “मिस्टर परफेक्शनिस्ट” शब्द जुड़ गया। लगान सफलतम यादगार फिल्म बन गई। इस फिल्म के बाद खेल विषयों को लेकर अनेक फिल्म चक दे इंडिया,भाग मिल्खा भाग, मेरी कॉम, ढिशुम, 83, बनी।कहने का मतलब फिल्म निर्माताओं को नया विषय मिला।
और हां, जब भी भारतीय क्रिकेट की पुरुष अथवा महिला टीम इंग्लैंड के साथ मैच खेलते है तो “लगान ” जरूर याद किया जाता है।
स्तंभकार-संजयदुबे




