PUBLIC; राजधानी में राजनीतिक अखाडा,आम जनता हलाकान, कर्मचारी संघ की तरह राजनीतिक दलों के आंदोलन पर बंदिश क्यों नहीं?

अर्जुन तिवारी

रायपुर, नई दिल्ली में गता दिवस लोकसभा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के प्रधानमंत्री आवास घेराव के विरोध में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भाजपाई कांग्रेस भवन का घेराव करने निकले थे। इस प्रदर्शन में कई कैबिनेट मंत्री भी शामिल हुये। प्रदर्शन के दौरान भाजपा और कांग्रेस कार्यकर्ता आमने-सामने आ गए, जिससे मौके पर तनाव की स्थिति बन गई। हालात को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को वाटर कैनन का इस्तेमाल करना पड़ा और आंसू गैस के गोले भी छोड़ने पड़े। भाजपा के कांग्रेस मुख्यालय घेराव के दौरान हुए बवाल में शंकर नगर चौक में अफरा-तफरी का माहौल रहा। यातायात अस्त-व्यस्त हो गई, जन -साधारण राहगीरों को भी कठिनाई का सामना करना पडा। लेकिन इस ओर न तो जिला प्रशासन का ध्यान रहा, न ही राजधानी के पुलिस कमिश्नर ने इसे गंभीरता से लिया।

बता दें राजधानी में कर्मचारी संगठनों को धरना प्रदर्शन की अनुमति नहीं है, लेकिन राजनीतिक पार्टियों को राजधानी में प्रदर्शन करने ,चक्काजाम करने, आथवा माहौल खराब करने की पूरी छूट है। इस भेदभाव का खामियाजा राजधानी की जनता को भुगतना पड रहा है। ऐसे में राजनीतिक पार्टी के लिए शहर में प्रदर्शन की अनुमति क्यों और कैसे मिल जाता है? कोई राजनीतिक पार्टी के नेताओं को पुलिस गिरप्तार क्यों नहीं करती, जबकि सरकारी कर्मचारियों को अगर प्रदर्शन करना होता है तो राजधानी से 40 किलोमीटर दूर नया रायपुर के तूता गाँव तक ही सीमित किया जाता है। क्या ये जिला प्रशासन और पुलिस कामिश्नर प्रणाली का दोहरा चरित्र नहीं कहा जाएगा?

कोई भी राजनीतिक पार्टी द्वारा पुलिस कमिश्नर प्रणाली की भय के बिना बेधड़क प्रदर्शन करके शहर की आवागमन को अस्त- व्यस्त करके आम लोगों को परेशान किया जाता है तो क्या ये कमिश्नर प्रणाली की खिल्ली नहीं उड़ रहा है। चाहे राजनीतिक पार्टी हो या नकटी गांव के लोग शंकर नगर चौक में हजारों की तादात में राहगीरों की चिंता किए बिना ही प्रदर्शन के नाम से धरना दे रहे है। वही छत्तीसगढ़ के सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही पुलिस कमिश्नर प्रणाली की खिल्ली उड़ाते हुए आमने सामने की लड़ाई लड़ रहे है। परिणाम स्वरूप नगरवासियों को काफी परेशानियों से गुजरना पड़ रहा है। एक व्यापारी ने बताया कि गत दिवस अपने कारोबार के सिलसिले में निकला था पर अपने गंतव्य तक पहुंच ही नहीं पाया। उसने राज्य शासन से मांग भी की है कि कमिश्नर प्रणाली को तहस नहस करने की बजाय उनकी नियमों को बनाए रखे।

ज्ञातव्य है कि छत्तीसगढ़ में सरकार यूसीसी की जोर शोर से चर्चा कर रही है यानी सबके लिए समान कानून पर बात की जा रही है। ऐसे में क्या राजनीतिक पार्टी खुद युसीसी का पालन कर पायेगी। आज की स्थिति को देखने से तो ऐसा लगता है कि राजनीतिक पार्टी ही इस कानून की धज्जियां उड़ाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी। कमिश्नर प्रणाली के ऊपर भी राजनीतिक पार्टियों द्वारा राजधानी केअंदर ही धरना प्रदर्शन करने से कई सवाल खड़े होते है, जब किसी सरकारी कर्मचारियों को प्रदर्शन करना हो तो तूता गाँव और राजनीतिक पार्टी के सत्ता पक्ष को शहर में प्रदर्शन करने की छूट क्यों दी जाती है किसी के गले नहीं उतरता ।

पूर्व में तत्कालीन कर्मचारी नेता विजय कुमार झा ने इस भेदभाव का विरोध किया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री को ज्ञापन भी दिया था लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई, और आज भी कर्मचारी संगठनों को धरना-प्रदर्शन करने नया रायपुर के तूता गांव में जाने बाध्य होना पडता है।

  • Narayan Bhoi

    Narayan Bhoi is a veteran journalist with over 40 years of experience in print media. He has worked as a sub-editor in national print media and has also worked with the majority of news publishers in the state of Chhattisgarh. He is known for his unbiased reporting and integrity.

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