0 लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय की पहल पर कई गांवों में छोड़े गए बीटल, जैविक नियंत्रण के सकारात्मक परिणाम
नारायणपुर, बस्तर के नारायणपुर जिले में तेजी से फैल रही खतरनाक खरपतवार गाजर घास (Parthenium hysterophorus) के नियंत्रण के लिए किए गए जैविक प्रयास अब प्रभावी परिणाम देने लगे हैं। लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय नारायणपुर की पहल पर जिले के कई गांवों में मैक्सिकन बीटल (Zygogramma bicolorata) के हमले से अब गाजर घास की वृद्धि में उल्लेखनीय कमी देखी जा रही है। यह प्रयोग अब माडल बनकर उभरने लगा है।
खरपतवार उन्म्मूलन अभियान के तहत कृषि महाविद्यालय में लगभग 2500 मैक्सिकन बीटल तैयार किए गए थे। इन बीटल्स को करीब ढाई साल पहले जिले के विभिन्न गांवों यथा बिंजली, पालकी, खड़कागांव, खेराभाट तथा कॉलेज परिसर में छोड़ा गया था। वर्तमान में इन सभी क्षेत्रों में बीटल सफलतापूर्वक स्थापित हो चुके हैं और गाजर घास की वृद्धि में स्पष्ट कमी देखी जा रही है।
ऐसे बनी जैविक वार की योजना
महाविद्यालय की पहल पर इस कार्य की शुरुआत यहां विस्तृत योजना और विशेषज्ञ मार्गदर्शन के साथ की गई थी। सामाजिक कार्यकर्ता एवं कृषि विशेषज्ञ डॉ. रत्ना नशीने ने इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर स्थित बायोकंट्रोल लैब की प्रमुख साइंटिस्ट डॉ. जया गांगुली से विस्तृत चर्चा की। इसके बाद बीटल्स को रायपुर की प्रयोगशाला से प्राप्त कर नारायणपुर लाया गया। इन बीटल्स को एनएसएस एवं रावे कार्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों की भागीदारी के साथ गांवों में छोड़ा गया। प्रारंभिक रिलीज के बाद इनका स्थानीय स्तर पर प्रजनन (breeding) भी किया गया,जिससे इनकी संख्या में वृद्धि हुई और इन्हें पुनः विभिन्न क्षेत्रों में छोड़ा गया।

ऐसे हमले करते है मैक्सिकन बीटल
कृषि विशेषज्ञ डॉ. रत्ना नशीने ने बताया कि मैक्सिकन बीटल गाजर घास की पत्तियों और कोमल भागों को खाकर पौधे को कमजोर कर देता है, जिससे उसका विकास रुक जाता है और धीरे-धीरे इसका प्रसार भी कम हो जाता है।अब जब यह बीटल प्राकृतिक रूप से स्थापित हो जाता है, तो यह लगातार गाजर घास को नियंत्रित करता रहता है। खरपतावार पर हमले का यह क्रम लगातार सालों साल जारीरहता है। ऐसे में मैक्सिकन बीटल द्वारा जैविक नियंत्रण एक प्रभावी, सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल समाधान सिद्ध हो रहा है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय, नारायणपुर का यह प्रयास गाजर घास नियंत्रण का एक सफल और प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभर रहा है, जिसे अन्य क्षेत्रों में भी अपनाया जा सकता है।
एलर्जी, त्वचा रोग और श्वसन संबंधी समस्याओं का कारण
गाजर घास, एक सर्वत्रा पाया जाने वाला खरपतवार है। इसका वैज्ञानिक नाम पार्थेनियम हिस्टेरोपफोरस है। इसे कई स्थानीय नामों जैसे-कांग्रेस घास, चटक चांदनी, कडवी घास आदि से भी जाना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार गाजर घास एक अत्यंत आक्रामक खरपतवार है, जो तेजी से फैलती है तथा मनुष्यों और पशुओं में एलर्जी, त्वचा रोग और श्वसन संबंधी समस्याओं का कारण बनती है।
भारत में गाजर घास
पहले यह खरपतवार केवल अकृषित क्षेत्रों में ही दिखाई देता था, किन्तु अब यह प्रत्येक प्रकार की पफसलों, उद्यानों, वनों, रोड व रेलवे मार्गों के किनारे पर पाया जाने लगा है। इसका उद्गम स्थान मैक्सिको, अमेरिका, त्रिनिडाड तथा अर्जेंटीना माना जाता है। भारत में गाजर घास को सर्वप्रथम 1956 में पुणे (महाराष्ट्र) में देखा गया। तब से यह खरपतवार निरन्तर वृद्धि एवं क्षेत्रा विस्तार करता हुआ, देश के लगभग अधिकतर भागों में पाया जाने लगा है।







