मुसीबत को चुनौती मानिए, जान देना पीड़ादायक है..

मेरे विभागीय सहकर्मी अशोक सवन्नी के परिवार सहित हम सबके लिए ये खबर बहुत पीड़ादायक है कि उनके पुत्र गौरव सवन्नी ने कतिपय प्रसंग के विवादास्पद होने पर हिम्मत हार गए। उनका जाना उनके लिए उनके हिसाब से उनका व्यक्तिगत निर्णय ही था लेकिन इसकी पीड़ा कितने लोग भोग रहे है, इसका अंदाजा गौरव क्यों नहीं लगा पाए? क्या हमे उन परिस्थितियों का सामना नहीं करना चाहिए जिसमें हमारी गलती हो या ना हो?
हमारे जीवन में अनेक अवसर ऐसे आते है जिसमें हम असहमत होते हुए भी मानसिक कारणों से गलती कर बैठते है या गलती हो जाती है। इससे परे हम ऐसी परिस्थिति में भी फंस जाते है जिसमें हम दोषी नहीं होते है। सच झूठ का फैसला  अंततः  न्यायालय के द्वारा विधिक रूप से होता है लेकिन हमारे आसपास का वातावरण सच झूठ को जाने बगैर ही निर्णयकर्ता हो जाते है। ऐसी स्थिति में सबसे ज्यादा विपरीत प्रभाव उस व्यक्ति पर पड़ता है ,जिसके संबंध में बात होती है।
अशोक सवन्नी के पुत्र गौरव सवन्नी के बारे में जैसा समाचार पत्रों में खबर आई है कि वे किसी युवती के साथ लिव इन रिलेशन में थे। कोई नई बात नहीं है। युवक युवती इस प्रकार के पश्चिम सभ्यता के प्रभाव के पहले भी छुपे हुए रूप में इस प्रकार  के रिलेशन में रहते थे।अब खुले रूप से रहते है। पहले समाज परिवार ऐसे संबंधों को मान्यता नहीं देता था, अब सहज रूप से सहमति देता है। लिव इन रिलेशन का सिद्धांत विधिक रूप से वैवाहिक गठबंधन में बंधने से पहले एक दूसरे को कम ज्यादा समय में समझना ही होता है। ज्यादातर लिव इन रिलेशन का परिणाम विवाह ही होता है, कम ही होता है कि ऐसे संबंध आधे रास्ते पर खत्म हो जाए।
पुरुष में एक मानसिक कमी होती है वह स्त्री को अपनी जातीय संपत्ति मानता है।आज के दौर में जहां लैंगिक असमानता लगभग खत्म हो चुकी है उस दौर में भी पुरुष भीतर से शंकालु होते है। स्त्री की मानसिक सोच पुरुष की तुलना में शक करने की आदत ज्यादा बलवती होती है। वे भी इस बीमारी से परे नहीं है। 

गौरव सवन्नी इन्हीं दो दायरे में से एक दायरे में आ गए। मामला पुलिस तक पहुंचा और जैसा होता है स्त्री का थाना पहुंचना ही उसके साथ हुए तथाकथित अन्याय का मापदंड बन जाता है। एफआईआर लिखा दे तो ये मान लिया जाता है कि अपने मान सम्मान को दांव पर रख शोषित होने पर न्याय की अपेक्षा रख रही है। वातावरण ही ऐसा है, इसके शिकार गौरव सवन्नी हो गए। हो सकता है उनके बीच शारीरिक संबंध  भी बने हो, क्या ये लिव इन रिलेशन का एक हिस्सा नहीं है। दो युवक युवती ,एक छत के नीचे काफी समय से रह रहे हो, विवाह के बारे में सोच रहे हो। विधि विधान के हिसाब से वयस्क है ऐसे में ये बात नई नहीं है।
अलगाव होने पर ऐसे संबंध को दुष्कर्म का रूप देना सही नहीं है। कोई युवती यदि अठारह वर्ष से ऊपर की है तो न्याय पालिका उसे हित अहित के बारे में बौद्धिक रूप से सक्षम मानता है।  ऐसे में एक पक्ष की बात को प्रामाणिक मान लेना आज के दौर में सही नहीं है।
ये तय माना जाता है कि पुरुष ही दोषी होता है इस विडंबना से पुलिस और न्यायालय दोनों को सचेत रहने की आवश्यकता है। किसी व्यक्ति को महज आरोप के आधार पर गिरफ्तार कर लेना, पुलिस की जल्दबाजी ही है। पुलिस के लिए एफआईआर दर्ज करना, गिरफ्तार कर लेना सामान्य प्रक्रिया है लेकिन जो व्यक्ति पेशेवर अपराधी नहीं है उसके  मानसिकता को न समझने का कितना बड़ा दुष्परिणाम सामने है। एक संभावना का अंत हो गया, एक परिवार से बेटा, भाई चला गया। दोस्त चला गया, रिश्तेदार चला गया।
जिस लड़की ने सद्भावना या दुर्भावना से गौरव को आरोपी बनाया उसे इस घटना के बाद शांति मिलेगी या अपराध बोध से ग्रस्त रहेगी, ये प्रश्न है लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न है कि हमें अपयश की स्थिति में भी धैर्य नहीं खोना चाहिए, जीवन अमूल्य है। ये व्यक्तिगत संपत्ति नहीं है, इस पर मां बाप, भाई बहन, रिश्तेदार, मित्रों का हिस्सा है।

स्तंभकार-संजय दुबे

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