POLITICS; साबरमती नदी के किनारे गुजरात मॉडल को भेदने कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में बनेगी रणनीति

नई दिल्ली, लोकसभा चुनाव 2024 का परिणाम सामने आने के बाद संसद में राहुल गांधी ने बीजेपी से कहा था कि हमने आपको अयोध्या में हराया है और 2027 में हम आपको गुजरात में हराकर दिखाएंगे। राहुल गांधी के इस बयान ने जाहिर कर दिया था कि वह गुजरात मॉडल की धारणा को तोड़ना चाहते हैं। पॉलिटिकल एनालिस्ट्स का साफ मानना है कि शायद यही वजह है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन अहमदाबाद में 8-9 अप्रैल को होने जा रहा है। इस अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी समेत अन्य वरिष्ठ नेता शामिल होंगे। इस अधिवेशन में प्रमुख राजनीतिक चुनौतियों और भारतीय राजनीति की भविष्य की दिशा पर चर्चा होने की उम्मीद है।

अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल नेशनल मेमोरियल में  कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक आयोजित करने से लेकर महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम में सभा करने तक, 8 और 9 अप्रैल को दो दिवसीय अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (AICC) का सत्र गुजरात में पटेल की विरासत को रेखांकित करता है। 8 अप्रैल की शाम को कांग्रेस के शीर्ष नेता साबरमती आश्रम में मिलेंगे, जो गांधीजी का घर था और 1917 और 1930 के बीच भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र था। दिन भर चलने वाला AICC सत्र 9 अप्रैल, 2025 को साबरमती नदी के किनारे होगा।

बीजेपी के गुजरात मॉडल का जवाब देने की कोशिश

कांग्रेस अपनी राजनीतिक विरासत के रास्ते बीजेपी के गुजरात मॉडल का जवाब देने का काम करना चाहती है। इसीलिए पार्टी गुजरात में छठी बार अपना सत्र आयोजित करने जा रही है। इससे पहले 1961 में गुजरात के भावनगर में कांग्रेस अधिवेशन हुआ था। इस साल कांग्रेस अध्यक्ष रहे महात्मा गांधी की 150वीं जयंती जबकि सरदार पटेल की 75वीं पुण्यतिथि है। कांग्रेस के ये दोनों दिग्गज नेता गुजरात से रहे हैं, जिन्होंने भारतीय इतिहास पर एक अमिट छाप छोड़ी है। कांग्रेस इस अधिवेशन के जरिये अपने राजनीतिक विरासत को जीवंत करना चाहती है।

कांग्रेस की विरासत को निशाना बनाया

बीजेपी तीन दशक से गुजरात की सत्ता पर कायम है और इन वर्षों में उसने कांग्रेस की पिछली विरासत को लगभग मिटा सा दिया है। यह भी कह सकते हैं कि कांग्रेस की विरासत पर बीजेपी ने कब्जा कर लिया है। बहरहाल, कई कांग्रेस नेताओं का मानना है कि कांग्रेस का गुजरात अधिवेशन प्रतीकात्मक है ताकि इसके गौरवशाली अतीत से प्रेरणा ली जा सके और वर्तमान चुनौती से निपटने का रास्ता निकाला जा सके।

गुजरात में अधिवेशन के मायने

असल में, पार्टी अधिवेशन के लिए गुजरात को चुनने के पीछे महात्मा गांधी और सरदार पटेल की राजनीतिक विरासत को फिर से पाने के कांग्रेस के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है। 1924 में पार्टी अधिवेशन के दौरान महात्मा गांधी कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए थे, संयोग से यह साल उसका शताब्दी वर्ष है। कांग्रेस ने इसलिए गुजरात का रास्ता चुना। पार्टी इसी बहाने कार्यकर्ताओं के बीच जान फूंकना चाहती है। गुजरात में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले AICC सत्र को पार्टी को फिर से ताकत देने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है,जहां वह 1995 से सत्ता से बाहर है। 1998 से बीजेपी राज्य में लगातार शासन में बनी हुई है।

गुजरात मॉडल पर फोकस

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में यह धारणा बनी है कि देश में जब भी कोई राजनीतिक-संस्कृति सामने आती है तो उसका मंच गुजरात बनता है। बीजेपी ने गुजरात मॉडल पर सवार होकर ही केंद्र की सत्ता हासिल की है। इसलिए कांग्रेस गुजरात मॉडल के जरिये ही बीजेपी को करारा जवाब देना चाहती है। राहुल गांधी का बार बार गुजरात दौरा भी यही संकेत देता है कि पार्टी इस राज्य पर फोकस करना चाहती है।

राहुल और मल्लिकार्जुन खरगे की नजर युवा कार्यकर्ताओं पर

राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे पार्टी को फिर से खड़ा करने के लिए जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं पर फोकस कर रहे हैं। इसीलिए राहुल गांधी लगातार पार्टी कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं। बिहार में होने वाली रैली भी राहुल गांधी कार्यकर्ताओं को संबोधित करेंगे। गुजरात में भी दोनों नेताओं का फोकस युवा कार्यकर्ताओं पर है।

कांग्रेस के गुजरात अधिवेशनों का इतिहास

बहरहाल, यह अहमदाबाद में कांग्रेस का तीसरा और स्वतंत्रता के बाद राज्य में दूसरा अधिवेशन होगा। कांग्रेस की पहली बैठक दिसंबर 1902 में अहमदाबाद में सुरेंद्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में हुई थी जिन्होंने निरंकुश ब्रिटिश शासन की अस्थिरता और जनता के समर्थन पर आधारित शासन की मांग की थी। कांग्रेस के नेता 1907 में रास बिहारी घोष के नेतृत्व में सूरत में जुटे। गुजरात में तीसरा अधिवेशन फिर से 1921 में अहमदाबाद में, हकीम अजमल खान के नेतृत्व में हुआ। 1938 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में कांग्रेस की हरिपुरा में बैठक हुई। एक ऐतिहासिक भाषण में बोस ने एक योजना आयोग का प्रस्ताव रखा और स्वतंत्रता के बाद भारत का नेतृत्व करने के लिए कांग्रेस की वकालत की। अंतिम अधिवेशन 1961 में भावनगर में हुआ, जिसकी अध्यक्षता नीलम संजीव रेड्डी ने की। इस वर्ष के सत्र का विषय है ‘न्यायपथ: संकल्प, समर्पण और संघर्ष’ था।

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