हिंदुस्तान के संविधान में देश को राज्यों का संघ कहा गया है। इस देश में संघीय सरकार का मतलब केंद्रीय सरकार है जिसे देश के आंतरिक और बाहरी संप्रभुता को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी देश की जनता जनादेश के माध्यम से देती है।
संघ’ संस्कृत भाषा का एक शब्द है। इसका सामान्य अर्थ सभा, समुदाय, समूह, संगठन या गठबंधन होता है। जब कुछ लोग किसी खास, उद्देश्य को पूरा करने के लिए एक साथ मिलकर काम करते हैं, तो उस समूह को संघ कहा जाता है। हिंदुस्तान में यूं तो अनेक संघ है लेकिन जो संघ सबसे चर्चित है उसका नाम है राष्ट्रीय सेवक संघ याने आरएसएस। हिंदुस्तान के संविधान में बयालीसवे संविधान संशोधन में जोड़े गए धर्मनिरपेक्ष से परे धर्म सापेक्ष संघ है। स्पष्ट हिंदी, हिंदुत्व और हिंदुस्तान के आदर्श को लेकर समर्पित।
इस संघ के सदस्य भारतीय जनता पार्टी में है और केंद्र सहित कई राज्यों की सरकारों में प्रधानमंत्री और मुख्य मंत्री सहित मंत्री भी थे और है भी।
ऐसा माना जाता है कि संघ पर्दे के पीछे से भाजपा को खुले आम मदद करती है और मौका लगा तो कान खींचने में भी पीछे नहीं रहती है।
एशिया महाद्वीप के कुछ देशों में युवाओं की आवाज मौजूदा सरकार के खिलाफ बुलंद हो रही है।नेपाल और बांग्लादेश में जेन जी के द्वारा किए गए विद्रोह के चलते सरकारी ध्वस्त हो गई है। हिंदुस्तान में भी देश की केंद्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक मामले को लेकर जेन जी ने केंद्र सरकार पर दबाव बनाकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा ले ही लिया है।
एक तरह से इसे मौजूदा सरकार के तथाकथित तानाशाही और हेकड़ी पूर्ण रवैये के खिलाफ गया निर्णय माना जा रहा है। देश के प्रधान मंत्री को भी आंदोलन की नजाकत को समझना पड़ा और रील लाइफ़ में प्रवेश करने की मजबूरी भी दिखी।
20 मार्च के संसद मार्च के नतीजे का आंकलन के संदर्भ में अपना अपना दृष्टिकोण है। आंदोलनकारी ,केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को जीत मान रही है तो केंद्र सरकार ये सोच कर खुश है कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इंडी ब्लॉक याने विपक्ष नहीं लेवा पाया। इस तरह जेन जी का विश्वास विपक्ष लेने में असफल रहा।
इस खुशी और ग़म के बीच जो बात अब सामने आ रही है वह रणनीति है या राजनीति, ये समझने वाली बात है। राष्ट्रीय सेवक संघ के प्रमुख ने एक सम्मेलन में देश भर के दो हजार ऐसे युवकों से सीधा संपर्क साधा जिन्हें जेन जी समूह का प्रतिनिधि माना जाता है। मोहन भागवत ने स्पष्ट रूप से कहा कि जेन जी राष्ट्र विरोधी नहीं है, बल्कि ईमानदार पीढ़ी है। उनका सवाल पूछना गलत नहीं है,तर्क से समझना चाहती है। सरकारों को युवाओं की बात सुननी चाहिए।लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन ,सहमति तक पहुंचने का माध्यम है।
इसका अर्थ ये निकाला जा सकता है कि केंद्र सरकार ने सीजेपी के आंदोलन को हल्के में लिया, जेन जी के गुस्से को समझने में देर की। ये भी मान के चली कि देख लेते है जोर कितना बाजुएं कातिल में है। सोनम वांगचुक को अनशन तुड़वा कर सफलता के पालने में झूलने के लिए बैठी सरकार के झूले की रस्सी ही टूट गई। युवाओ का आंदोलन अपने उद्देश्य पूर्ति के साथ खत्म हो गया।इसके बाद आरोप प्रत्यारोप का दौर भी चला और अंततः मोहन भागवत ने ये संदेश तो सरकार को दे ही दिया कि सरकार संचालन का रवैया सुधारने की जरूरत है।
प्रश्न ये भी उठता है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख की बात डेमेज कंट्रोल का हिस्सा है या केंद्रीय सरकार के प्रति नाराजगी? इस बात से किसी को इंकार नहीं होगा कि आरएसएस कभी भी ये चाहेगी कि भाजपा, सत्ता में न रहे क्योंकि संघ के विचारों के प्रचार और प्रसार के लिए भाजपा की ही सरकार अनुकूल माहौल देने का कार्य करती है।इसके बावजूद संघ ये अपेक्षा कभी नहीं करता है कि सरकारे अपने आचरण से अधिनायकवादी दिखे या तानाशाही जैसा माहौल दिखे। इस आधार पर माना जा सकता है कि आगामी उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव को मद्देनजर रखते हुए युवा आक्रोश को खत्म करने की बेहतर रणनीति है और राजनीति भी।
स्तंभकार-संजयदुबे







