SC;सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी- करप्शन केस में सिर्फ पैसे की बरामदगी से दोषी नहीं…

नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि करप्शन केस में किसी को दोषी करार देने के लिए सिर्फ रुपये की बरामदगी पर्याप्त नहीं है। पूरी घटना जैसे रुपये की मांग, स्वीकृति और उसकी बरामदगी की पुष्टि जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम-1988 की धारा-20 के तहत दोषसिद्धि के लिए केवल धन की बरामदगी पर्याप्त नहीं है।

सरकारी कर्मी को किया बरी
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पंकज मित्तल की अगुआई वाली बेंच ने यह व्यवस्था देते हुए एक सरकारी कर्मी को बरी कर दिया जिस पर एक स्कूल शिक्षक से जाति प्रमाणपत्र रिपोर्ट के लिए कथित तौर पर 1,500 की रिश्वत मांगने का आरोप था। कोर्ट ने पाया कि रिश्वत की मांग साबित नहीं हो पाई चाहे स्वीकृति और बरामदगी का प्रमाण मिल भी गया हो लेकिन मांग साबित नहीं हुई है। कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया।

क्या है मामला?
इस मामले में हाई कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि पैसे का लेन-देन हो जाने से यह खुद-ब-खुद नहीं मान लिया जा सकता कि वह किसी मांग के परिणामस्वरूप हुआ था। कानून के अनुसार दोषसिद्धि के लिए मांग, स्वीकृति और बरामदगी की पूर्ण कड़ी स्थापित होनी चाहिए। अगर, प्रारंभिक मांग ही संदेहास्पद हो, तो अन्य दो घटकों भुगतान और बरामदगी के प्रमाणित होने के बावजूद कड़ी अधूरी मानी जाएगी। इस टिप्पणी को न्यायसंगत माना गया। इस मामले में आरोपी के खिलाफ यह आरोप था कि वह एक टीचर से जाति प्रमाणपत्र की वैधता रिपोर्ट अग्रेषित करने के लिए रिश्वत मांगी थी। एक जाल बिछाया गया और फिर आरोपी से रिश्वत वाली धन की बरामदगी हुई। आरोपी ने दावा किया कि वह राशि एक निजी उधार की वापसी थी। निचली अदालत ने दोषसिद्ध किया था, लेकिन हाई कोर्ट ने शिकायतकर्ता की विश्वसनीयता और मांग के प्रमाण पर संदेह करते हुए उसे बरी कर दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया।

पेश मामले के मुताबिक दावनगिरी के तालुका में आरोपी एक्सटेंशन ऑफिसर के तौर पर तैनात था। आरोप है कि 7 फरवरी 2007 को उक्त अधिकारी ने एक टीचर से जाति प्रमाण पत्र रिपोर्ट देने के एवज में 1500 रुपये रिश्वत लिए। इस मामले में निचली अदालत ने 23 दिसंबर 2011 को आरोपी को दोषी करार दिया और दो साल कैद की सजा सुनाई लेकिन कर्नाटक हाई कोर्ट ने फैसले को पलटते हुए उसे बरी कर दिया। इसके बाद राज्य की लोकायुक्त पुलिस की ओर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने 19 मई को दिए अपने फैसले में जोर देकर कहा कि जब तक अभियोजन पक्ष मांग से लेकर स्वीकार्यता तक की पूरी शृंखला सिद्ध नहीं करता, तब तक केवल करप्शन से जुड़े धन की बरामदगी से अभियुक्त को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने पहले क्या कहा है?

सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा है कि करप्शन रोकने वाले कानून की धारा-20 के तहत अपराध का अनुमान तभी लागू होगा जब अवैध रिश्वत की मांग और उसको स्वीकार करने का सबूत हो। धारा 20 यह मानती है कि यदि कोई पब्लिक सर्वेंट अनुचित लाभ स्वीकार करता है, तो वह किसी कार्य को अनुचित तरीके से प्रभावित करने के लिए ऐसा कर रहा है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित नहीं होता कि रिश्वत की मांग और उस रिश्वत को स्वीकार किया गया था, तब तक इस धारा के तहत कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि करप्शन का अपराध किया गया है। अब मौजूदा फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मांग से लेकर बरामदगी की कड़ी पूरी होने पर ही अपराध होने की बात कही है।

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