नईदिल्ली, भारत के मौजूदा और पूर्व सांसद-विधायकों के खिलाफ 4,000 से अधिक आपराधिक मामले लंबित हैं। इनमें से 519 मामलों की सुनवाई 10 साल से ज्यादा समय से चल रही है। अब ऐसे में सवाल यही उठता है कि राजनीति साफ कैसे होगी?
सुप्रीम कोर्ट में सौंपी गई विजय हंसारिया की रिपोर्ट में असोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ( ADR ) के विश्लेषण के हवाले से कहा गया है कि 28 में से 14 मुख्यमंत्रियों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। इनमें तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल हैं। कई मौजूदा और पूर्व सांसद-विधायकों के खिलाफ 4,000 से अधिक आपराधिक मामले लंबित हैं। इनमें से 519 मामलों की सुनवाई 10 साल से ज्यादा समय से चल रही है।
विशेष न्यायालय
राजनीति में अपराधीकरण पर अंकुश लगाने के लिए पिछले 10 बरसों से सुप्रीम कोर्ट आदेश दे रहा है। 10 मार्च 2014 को न्यायालय ने कहा था कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8(1), 8 (2) और 8 (3) के तहत आरोप तय होने के साल भर के भीतर ऐसे मामलों की सुनवाई हो जानी चाहिए। नवंबर 2017 में अदालत ने केंद्र को सांसदों-विधायकों से जुड़े मामलों में स्पेशल कोर्ट बनाने को कहा था। सरकार ने इसके लिए 12 विशेष न्यायालयों का प्रस्ताव भी दिया।
पारदर्शिता पर जोर
25 सितंबर 2018 को न्यायालय ने उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड सार्वजनिक करने को कहा। अदालत ने आदेश दिया कि उम्मीदवारों को प्रमुखता से इसकी जानकारी देनी होगी और पार्टियों को भी वेबसाइट, सोशल मीडिया, अखबार के जरिए इसे बताना होगा। कोर्ट ने कहा कि आरोप तय होने के चरण में उम्मीदवारों की अयोग्यता के लिए संसद कानून बना सकती है। फिलहाल, दोष सिद्धि के बाद सांसद-विधायक अयोग्य हो जाते हैं। इसलिए न्यायालय का जोर तेज सुनवाई, निगरानी और पारदर्शिता पर है।
एक्शन नहीं
विधि आयोग की 244वीं रिपोर्ट में गंभीर अपराधों में आरोप तय होने के दौरान जनप्रतिनिधियों को अयोग्य ठहराने का प्रस्ताव दिया गया था। इसमें 5 साल या उससे अधिक सजा वाले अपराधों को शामिल करने और नामांकन की जांच से एक साल पहले दायर आरोपों को बाहर रखने की सिफारिश की गई थी। मगर इस पर कोई कानून नहीं बना। नतीजतन, मौजूदा लोकसभा के 46% सांसदों ने अपने खिलाफ अपराधिक और 31% ने गंभीर आपराधिक मामलों में जानकारी दी है।
विधानसभा में भी दागी
राजनीति में अपराधीकरण की समस्या राज्य विधानसभा और राज्यसभा में भी है। एडीआर के 2025 के विश्लेषण के मुताबिक, 4,092 विधायकों में 1,861 यानी 45% ने खुद पर आपराधिक मामले और 1,205 यानी 29% गंभीर पराधिक मामले होने की जानकारी दी है। जून 12026 के ADR विश्लेषण में मौजूदा राज्यसभा सदस्यों में 31% ने आपराधिक और 6% ने गंभीर मामलों की जानकारी दी। 13 फरवरी 2020 को सर्वोच्च न्यायालय ने दलों को आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को चुनने का कारण बताने को कहा था। हालांकि कई दलों ने अलग-अलग उम्मीदवारों के लिए एक जैसा स्पष्टीकरण दिया है।
आंतरिक नीति
सुप्रीम कोर्ट ने नियम नहीं मानने वाले दलों की जानकारी चुनाव आयोग से मांगी है। हालांकि, रिकॉर्ड से यह पता चलता है कि आयोग इन निर्देशों की निगरानी कितने प्रभावी तरीके से कर रहा है। इसकी जानकारी भी नहीं है कि 2021 के ब्रजेश सिंह बनाम सुनील अरोड़ा मामले के बाद उल्लंघन करने वाले दलों पर क्या कार्रवाई हुई। कोर्ट ने तब कई दलों पर जुर्माना लगाया था । राजनीतिक दलों को अब अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
सख्ती की सिफारिश
चुनाव आयोग के SVEEP कार्यक्रम में धनबल, बाहुबल, आपराधिक इतिहास और उम्मीदवारों के हलफनामे जैसे मुद्दों पर विशेष अभियान की दरकार है। मतदान-केंद्रों के बाहर यह जानकारी होनी चाहिए ताकि सभी तबके के लोगों को पता रहे। हंसारिया ने मामलों के जल्द निपटारे के लिए विशेष अदालतें बनाने, हाई कोर्ट की निगरानी बढ़ाने, आरोप तय होने के बाद एक साल में सुनवाई पूरी करने और पुराने मामलों में रोजाना सुनवाई जैसे उपाय सुझाए हैं। आरोपी की गैरहाजिरी और अनावश्यक स्थगन पर भी सख्ती की सिफारिश की है।







