
बाजारवाद की दुनिया में किसी भी प्रोडक्ट को बेचने के लिए नए नए नुस्खे अपनाना कोई नई बात नहीं है। समग्र रूप में कोई बड़ा त्यौहार हो तो बड़ा अवसर बनता ही है। हिंदुस्तानी संस्कृति में भाई बहन के बीच रिश्ते के नवीनीकरण और प्रगाढ़ता के लिए रक्षा बंधन का त्यौहार आदिकाल से सद्भावना और गरिमा के साथ मनाया जाता है। कितने ही जेन जी या अल्फ़ा जी आए , सद्भावना का पर्व अपनी भव्यता और आत्मीयता को बनाए रखेगा।
गिवा एक आभूषण निर्माता है।राखी के पर्व को केंद्र में रखकर एक विज्ञापन दर्शकों के सामने परोसा गया। इस विज्ञापन के केंद्र में हिंदी फिल्मों की अभिनेत्री कृति सेनन है। बाज़ारू विज्ञापनों में कैसे कपड़े पहने जाते है ये सभी जानते है। पुरुषों को आकृषित करने के लिए अक्सर प्रोडक्ट बेचने वाले महिला मॉडलों से अंग प्रदर्शन करवाते है। विवा भी इससे परहेज नहीं किया। अगर रक्षा बंधन का आड़ नहीं होता तो किसी को भी आपत्ति नहीं होती।
बवाल दो कारणों से मचा ।पहला कृति सेनन के कपड़े , रक्षा बंधन के परपंरा के अनुकूल नहीं थे दूसरा, एक कुत्ते को राखी बांधने का दृश्य गले से नीचे कदापि नहीं उतरता है। राष्ट्रीय स्तर पर विवाद इतना बढ़ा कि हजार स्पष्टीकरण देने के बावजूद विवादास्पद विज्ञापन को वापस लेना पड़ गया। ये वापसी ही तय करती है कि हिंदुस्तानी त्योहारों सहित भावनाओं से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
इस विज्ञापन के समर्थन और विरोध में बड़े बड़े लोग अपना मत रख चुके है।समर्थन करने वालो का कहना है कि आजाद देश में महिला क्या पहने ये उसका व्यक्तिगत मामला है।दूसरी तरफ विरोध करने वालो का कहना है कि भारतीय संस्कृति में पर्व के अनुसार पहनावा अनिवार्यता है। इसमें किसी भी भी प्रकार का पश्चिमीकरण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
हाल ही में जंतर मंतर के आंदोलन में देश ने महिलाओं के पहनावे के साथ साथ भाषा का विद्रूपीकरण देखा सुना है। खुद को अति प्रगतिशील कहने वाले परिवार की महिला सदस्य आज भी ऐसे कपड़े पहनती है जिन्हें देखने में उचित नहीं लगता है लेकिन उनका देह है, उनके पैसे है, उनकी जीवन शैली है तो किसी को आपत्ति नहीं होती है। फिल्मों में महिला अभिनेत्रियां मर्यादा की सीमाएं लांघते रहती है, इनको देखने के लिए दर्शक चार पांच सौ रुपए की टिकट कटा कर देखने जाता है। कोई विवाद नहीं होता है। बाजारवाद है, जो बिकता है वो दिखना चाहिए। राखी का आड़ लिया गया तो कोहराम मच गया। वास्तव में कृति सेनन का पहनावा इस विज्ञापन में पर्व के हिसाब से आपत्तिजनक था। उन्होंने अपने पहनावे को महिला आजादी से जोड़ा लेकिन बात स्वीकार्य नहीं हुई। एक नेता ने भी आपत्ति किया कि महिलाओं के पहनावे पर किसी को आपत्ति नहीं होना चाहिए, इसका उत्तर जो दिया गया वह पर्याप्त है कि क्या बिकनी पहन कर राखी बांधी जा सकती है?
दरअसल, आजादी शब्द की व्याख्या में लोग सौ फीसदी आजादी लेते है, ये गलत बात है। आजादी भी नियंत्रित होती है, एक मर्यादा के भीतर होती है। इससे आगे बढ़ने पर कानून का नियंत्रण तो होता ही है सामाजिक नियंत्रण से भी दो चार होना पड़ता है। विवा के विज्ञापन में भी सामाजिक दबाव का नतीजा सामने है।
स्तंभकार-संजयदुबे







